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‘कोरोना’ के कारण ‘यांत्रिक कारागार’ में कैद होती युवा पीढ़ी

डॉ. निर्भय कुमार असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, रामजस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली 

सामाजिक सरंचना के संदर्भ में व्यक्ति या मनुष्य को उस संरचना की एक इकाई माना जाता है जिसका उस सामाजिक सरंचना में एक निर्धारित स्थान और उसके अनुरूप उसकी एक निर्धारित भूमिका होती है। उस व्यवस्था में यह स्थान ग्रहण करना एक सामाजिक प्रक्रिया के तहत होता है। जिसे समाजीकरण की प्रक्रिया कहते हैं। इस प्रक्रिया के तहत वह कुछ मानदंडों के अनुरूप यह स्थान हासिल करता है। इस प्रकार सामाजिक सरंचना का अर्थ व्यक्ति या व्यक्ति समूहों का वह ढाँचागत व्यवस्थित स्वरूप है जिसमें उनके सामाजिक संबंध किसी खास संस्थात्मक मूल्यों से प्रभावित और नियंत्रित होते हैं। समाजीकरण की प्रक्रिया के तहत वह समाज हमारे अलग अलग क्रिया-कलापों, रवैयों, रुझानों, पसंद-नापसंद, यौन व्यवहार और यहाँ तक कि हमारी चाहतों, इच्छाओं या कामनाओं को भी समाज के अनुकूल निर्धारित करता है। इतना ही नहीं, यह समाज-व्यवस्था सुदृढ़ और मजबूत हो और एक महिला या पुरुष के रूप में हम इस व्यवस्था को सुचारू रूप से पीढ़ी-दर-पीढ़ी गतिशील बनाए रखने में अपनी भूमिका अदा करते रहें, इसके लिए यह समाज हमारे व्यवहारों के नियंत्रण और निगरानी के लिए कायदे-कानून, संस्थाएँ और तंत्र या तकनीक बनाता व विकसित करता है। आगे चलकर यदि कोई इन निर्धारित कसौटियों के विपरीत चलता है या इन्हें चुनौती देते हुए मानने से इनकार करता है और इन कायदे-कानूनों को तोड़ता है, तब यह समाज उनके लिए दंड-विधान का निर्माण भी करता है। इसी के अनुरूप उसे न्याय व्यवस्था के माध्यम से कारागार में डाला जाता है ताकि वह एकाकी जीवन व्यतीत करते हुए पुनः अपने समाज, उसके कायदे कानूनों एवं समाजीकरण की प्रक्रिया पर पुनर्विचार कर सके और समाज में पुन: सामान्य व स्वाभाविक जीवन व्यतीत करने के योग्य बन सके। सामाजिक संरचना के भीतर प्रत्येक मनुष्य को समाजीकरण की इस प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। हम चाहे किसी भी आयु या वर्ग के हों, इस प्रक्रिया से गुजरे बगैर अपने व्यक्तिव एवं जीवन का सर्वांगीण विकास कर ही नहीं सकते और न ही सामाजिक संरचना को सुदृढ़ व प्रगतिशील बना सकते हैं। सामाजिक संरचना के भीतर समाजीकरण की यह प्रक्रिया जन्म से लेकर मृत्यु तक अनेक स्तरों पर निरंतर चलती रहती है। इस प्रक्रिया के अनेक आयाम व अलग-अलग स्वरूप होते हैं। हम परिवार में लालन-पालन के दौरान, स्कूल, कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों में शिक्षा-दीक्षा अर्जित करने के दौरान, नौकरी-पेशा करने के दौरान, सामाजिक-जीवन व राष्ट्रीय-जीवन में अपनी भूमिका अदा करने के दौरान अनेक स्तरों पर इस प्रक्रिया से गुजरते रहते हैं जिसके कारण हमारा पारिवारिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय चरित्र-निर्माण संभव हो पाता है। किसी भी राष्ट्र व उसके भीतर कायम सामाजिक संरचना के सुदृढ़ीकरण एवं प्रगति के निमित्त उसके नागरिकों, खासकर युवा-पीढ़ी का इस प्रक्रिया से गुजरना बेहद अनिवार्य होता है। किंतु समाजीकरण की प्रक्रिया के दौरान जो सबसे महत्त्वपूर्ण व अनिवार्य स्तर या आयाम होता है वह है शिक्षा-दीक्षा, ज्ञानार्जन, संस्कार एवं चरित्र निर्माण से जुड़ा आयाम । यह सामाजिक संरचना के भीतर परिवार में माँ के प्रथम आलिंगन, पिता व अन्य सदस्यों के देखरेख से प्रारंभ होता है और स्कूल, कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों में गुरुजनों के साथ संवाद कायम करने, उनका मार्गदर्शन व सान्निध्य प्राप्त करने, सहपाठियों व अन्य अनेक मित्रों के साथ कक्षा में प्रत्यक्ष सानिध्य व संवाद कायम करने एवं शिक्षणेतर गतिविधियों व अन्य क्रियाकलापों जैसे- खेल-कूद, खेती-किसानी, पाक-कला, स्वच्छता-अभियान, डिबेट व विद्यार्थी आन्दोलनों आदि में भाग लेने के रूप में चलता रहता है। इस दौरान केवल शिक्षा-दीक्षा, ज्ञानार्जन एवं चरित्र निर्माण ही नहीं होता, अपितु हमारा समुचित शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक व आध्यात्मिक विकास भी होता जाता है। यद्यपि यह प्रक्रिया बहुत महीन होती है और हमें पता भी नहीं चलता कि हम इस दौरान क्या-कुछ सीख व अर्जित कर जाते हैं। सामाजिक शब्दावली में यह हमारा विद्यार्थी जीवन होता है। किंतु विडंबना यह है कि वर्तमान समय में कोरोना’ संकट ने सदियों से कायम सामाजिक ताने-बाने को ध्वस्त कर पूरी की पूरी समाजीकरण की प्रक्रिया और उसके भीतर चलने वाली शिक्षण व शिक्षणेतर गतिविधियों को बाधित व तहस नहस कर दिया है। इसका सबसे अधिक और नकारात्मक प्रभाव विद्यार्थी जीवन एवं युवा पीढ़ी पर पड़ रहा है। शिक्षण व शिक्षणेतर गतिविधियों एवं अन्य क्रियाकलापों में अभ्यस्त विद्यार्थी एवं युवा पीढ़ी इस ‘कोरोना काल’ में अनेक ‘नॉर्मल लाइफ डिजीज (Normal Life Diseases)’ व मनोरोगों (Mental Diseases) जैसे- अप्रत्याशित दुश्चिंता या व्यग्रता-विकार या घबराहट (Anxiety Disorder), मानसिक अवसाद या खिन्नता या चिड़चिड़ापन (Depression Disorder), अचानक सिरदर्द का बढ़ना (Random Improvement of Head ache), पेट के रोग (Stomach Diseases), नशे की लत, टी.वी., मोबाइल फोन, लैपटॉप, टैब आदि के स्क्रीन की लत पड़ जाना (Addiction to Screen) आदि से ग्रस्त होते जा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा और प्रमुख कारण है उन प्रक्रिया’ एवं मानसिक व शारीरक गतिविधियों का बाधित हो जाना जिसका आधार समाजीकरण की प्रक्रिया होती है। 

बचाव के लिए ‘सामाजिक-दूरी’ का पालन करना ही एकमात्र विकल्प हमारे सामने मौजूद है, ऐसे में विद्यार्थियों व युवा पीढ़ी के सामने यह बड़ा संकट गहराने लगा है कि वे किस माध्यम से अपनी दिनचर्या में ‘स्वाभाविक संप्रेषण प्रकिया या संवाद’ एवं मानसिक व शारीरिक गतिविधियों तथा अन्य क्रियाकलापों को जारी रखें। कक्षा-कक्ष-शिक्षण पूर्णतया बंद हो जाने एवं प्रश्नोत्तर प्रक्रिया से वंचित हो जाने के कारण अमूमन विद्यार्थी स्वाध्याय के दौरान उठने वाली समस्याओं व शंकाओं का समुचित समाधान पाने में असमर्थ हैं। वे अपनी होने वाली परीक्षाओं को लेकर भयभीत हैं। अध्ययन में गहरी रुचि रखने वाले विद्यार्थी डिप्रेशन (Dipression) के शिकार होते जा रहे हैं। उच्च शिक्षा अर्जित कर रहे विद्यार्थियों-शोधार्थियों में अपने भावी कॅरियर को लेकर गहरी चिंता होने लगी है। अध्ययन सामग्री के स्रोत के रूप में इंटरनेट रूपी एकमात्र विकल्प होने के कारण पुस्तकों की संस्कृति को भारी नुकसान हो रहा है। इसके साथ ही इंटरनेट से प्राप्त अध्ययन-सामग्री की प्रामाणिकता को लेकर भी विद्यार्थियों में गहरी चिंता है। कुल मिलाकर विद्यार्थियों पर इसका दूरगामी नकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकता है। ‘कोरोना’ संकट काल में विद्यार्थियों व युवा-पीढी की उपर्युक्त समस्याओं और उन पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को अभिभावकों सहित सरकार भी चिंतित है। एक ओर अभिभावक अपने बच्चों की कॉउन्सलिंग करने-कराने में लगे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार व संबंधित मंत्रालय भी विद्यार्थियों की उपर्युक्त समस्याओं को दूर करने के अनेक विकल्प तलाश रहे हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इस विकट समय में विद्यार्थियों व युवा-पीढ़ी की इन समस्याओं को कैसे दूर किया जा सकता है और इसके क्या-क्या कारगर विकल्प हो सकते हैं? यद्यपि इस संकट काल में शिक्षा-व्यवस्था व अध्ययन-अध्यापन की प्रक्रिया को पटरी पर लाने के लिए कुछ स्कूल, कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों ने जूम मीटिंग, गूगल मीट, माइक्रोसॉफ्ट टीम, स्काइप जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों के साथ-साथ यूट्यूब, व्हाट्सएप, फेसबुक आदि सोशल नेटवर्किंग माध्यमों द्वारा ऑनलाइन शिक्षण का विकल्प अपनाया है। किंतु इस महामारी के संकट में डिजिटल शिक्षण का कुछ लोगों द्वारा इस प्रकार से महिमामंडन किया जा रहा है, मानो हमारी शिक्षा व्यवस्था की हर समस्या का समाधान इसमें ही समाहित है। डिजिटल या ऑनलाइन शिक्षण का गुणगान करने के पूर्व हमें कुछ प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करना होगा। पहला यह कि क्या वास्तव में डिजिटल शिक्षण भारत जैसे देश की समस्त शैक्षणिक आवश्यकताओं की पूर्ति का सार्थक व कारगर समाधान है? क्या डिजिटल शिक्षण कक्षा-कक्ष शिक्षण का समुचित विकल्प है? क्या यह भारतीय गुरुकुल परंपरा व परिवेश के अनुकूल है? क्या यह विद्यार्थियों के समुचित मानसिक व शारीरिक विकास में सहायक है? इन सभी प्रश्नों का उत्तर है- नहीं। डिजिटल या ऑनलाइन शिक्षण को महिमामंडित करने वाले लोग ऐसे अनेक प्रश्नों पर चुप्पी साध लेते हैं। वास्तव में शिक्षण के इस माध्यम ने व्यक्ति एवं चरित्र-निर्माण, समाज-कल्याण एवं ज्ञान के उतरोत्तर विकास जैसे शिक्षा-दीक्षा व ज्ञानार्जन के तीन प्रमुख उद्देश्यों पर ही प्रश्न चिह्न लगा दिया है। लंबे समय से कंप्यूटर, टेबलेट, मोबाइल आदि डिजिटल माध्यमों पर आधारित शिक्षण के कारण विद्यार्थियों में स्क्रीन की लत (Adiction to Screen), मानसिक अवसाद, आँखों पर नकारात्मक प्रभाव, हेडेक (Headach) की समस्याएँ उत्पन्न होने लगी हैं और अध्ययन-अध्यापन अरुचिकर लगने लगा है। हम डिजिटल या ऑनलाइन शिक्षण पद्धति के माध्यम से अच्छे से अच्छे शिक्षकों या एक्सपर्ट से लेक्चर करा सकते हैं या उनका लेक्चर रिकॉर्ड करके विद्यार्थियों तक पहुँचा सकते हैं। सोचने पर यह बेहद सरल, कम खर्चीला और आकर्षक उपक्रम लग सकता है। लेकिन इस प्रक्रिया को अपनाने के पूर्व हमें इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार करना होगा कि इससे कितने प्रतिशत विद्यार्थी लाभान्वित हो रहे हैं या कितने प्रतिशत विद्यार्थियों को यह लेक्चर समझ में आ रहा है या वे इसके प्रति कितना आकर्षित हो रहे हैं? अमेरिका में प्रकाशित एक हालिया रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया है कि लर्निंग प्रोसेस में अत्यधिक विद्यार्थियों को किसी विषय पर एक्सपर्ट से अधिक अपने टियर ग्रुप (Teer Group) अर्थात् अपने सहपाठियों के साथ सामूहिक संवाद करने से ज्ञान प्राप्त होता है। अपने टियर ग्रुप के साथ बातचीत उनकी समझ को अत्यधिक विकसित करने में सहायक है। यह कार्य डिजिटल या ऑनलाइन शिक्षण पद्धति या रिकार्डेड लेक्चर से संभव नहीं है। इसके अतिरिक्त कक्षा-कक्ष-शिक्षण पद्धति में लगभग 90 प्रतिशत से अधिक विद्यार्थियों एवं शिक्षकों के मध्य संप्रेषण लेक्चर के दौरान शिक्षकों के हाव-भाव से होता है जो डिजिटल शिक्षण पद्धति में संभव नहीं है। यह सत्य भी है कि संप्रेषण प्रभावी तभी होता है जब मौखिक संप्रेषण के साथ-साथ वक्ता हाव-भाव का भी सहयोग ले। आज डिजिटल शिक्षण से गुजरने वाले न जाने कितने प्रतिशत विद्यार्थी हैं जो ऐसी अनेक समस्याओं का सामना कर रहे हैं, किंतु समय व संसाधनों की सीमाओं के कारण वे इससे निजात नहीं पा सकते । इस प्रकार उनके ज्ञानार्जन पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। इतना ही नहीं, पूरा समय घर पर रहकर व्यतीत करने के कारण अत्यधिक बच्चे अभिभावकों के चिड़चिड़ेपन एवं घरेलू हिंसा का शिकार भी होने लगे हैं। कुल मिलाकर इस संकट काल में विद्यार्थी व युवा-पीढ़ी यंत्रों के मकड़जाल में फंस कर रह गए हैं। आगे चलकर इससे बहार निकलना उनके लिए बेहद अस्वाभाविक और चुनौतिपूर्ण होगा। ये सभी समस्याएँ इस तथ्य को प्रमाणित करती हैं कि कक्षा-कक्ष-शिक्षण का कोई अन्य विकल्प हो ही नहीं सकता। क्योंकि परंपरागत अर्थात् आमने-सामने के कक्षा-कक्ष पठन-पाठन प्रक्रिया में विद्यार्थियों के समक्ष केवल ज्ञान नहीं उँडेला जाता है, अपितु परोक्ष रूप में उनके चरित्र-निर्माण की प्रक्रिया भी सतत चलती रहती है। इसके साथ ही कक्षा-कक्ष-शिक्षण के परिवेश में विद्यार्थियों में सह-अस्तित्त्व एवं सहयोग, व्यापक साझेदारी, सामूहिकता एवं वैचारिक सहिष्णुता का भाव एवं सांस्कृतिक विविधता का संस्कार भी विकसित होता रहता है। कक्षा-कक्ष-शिक्षण पद्धति में शिक्षक का आचरण, व्यवहार एवं उसके समस्त क्रियाकलापों का विद्यार्थियों पर अत्यंत गहरा प्रभाव पड़ता है। 

शिक्षण संस्थानों के परिसर में विविधतापूर्ण सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थियों एवं विभिन्न विषयों के विद्यार्थियों का आपस में अंतरव्यवहार, बहस, विवेचन, संवाद एवं तर्क-वितर्क उनके व्यक्तित्व के समग्र व संतुलित विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस प्रकार ज्ञानार्जन के साथ-साथ विभिन्न शिक्षणेतर गतिविधियाँ एवं अन्य क्रियाकलाप विद्यार्थियों व युवाओं के व्यक्तित्व एवं चरित्र-निर्माण को पूर्णता प्रदान करते हैं। इसके अतिरिक्त भारतीय समाज में यदि हम परंपरागत ‘गुरुकुल शिक्षण-पद्धति’ का अवलोकन करें, तो वहाँ शिक्षण परिसर में विद्यार्थी अपने गुरुओं के माध्यम से केवल ज्ञानार्जन ही नहीं करते थे, अपितु पाक कला, खेती-किसानी करना, क्यारी बनाना, पौधे लगाना, साफ-सफाई रखना आदि सामाजिक-जीवन के अनेक क्रियाकलापों में प्रशिक्षित होते थे। आज भी विद्यार्थी स्कूल, कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों के परिसरों में तथा छात्रावास में रहने के दौरान इन कलाओं में प्रशिक्षित एवं निपुण होने का अवसर प्राप्त करते हैं। क्या यंत्र आधारित डिजिटल या ऑनलाइन शिक्षण के माध्यम से इन कमियों को किसी प्रकार पूरा किया जा सकता है? डिजिटल या ऑनलाइन शिक्षण का गुणगान करने वाले लोगों को इन प्रश्नों का उत्तर देना होगा। इस शिक्षण पद्धति से विद्यार्थी और इस देश की युवा पीढ़ी ज्ञान तो प्राप्त कर लेगी, किंतु उसका मनोजगत एक रोबोट की तरह ही यांत्रिक होगा। आज की यांत्रिक-दुनिया में युवा-पीढ़ी अपने मित्रों से जुड़ने के लिए अधिक से अधिक सोशल नेटवर्कों जैसे फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्वीटर, इन्स्टाग्राम आदि का प्रयोग कर रही है। आज इन वर्चुअल नेटवकों पर एक-एक व्यक्ति के कई-कई हजार मित्र एवं फोलोअर्स होते हैं, किंतु उस व्यक्ति और उन मित्रों के मध्य कोई भी भावनात्मक या रागात्मक या आत्मीय संबंध कायम नहीं होता जो रियल लाइफ में एक मित्र के साथ होता है। इस प्रकार विद्यार्थी और देश के अन्य युवा इंटरनेट और वर्चुअल वर्ल्ड के वर्तमान दौर में पहले से ही समाज से कटते जा रहे हैं, ऐसे में उनके सामाजिक कौशल और संतुलित-सम्यक व्यक्तित्व के विकास में डिजिटल या ऑनलाइन शिक्षण पद्धति साधक के बजाय बाधक साबित हो सकती है। इतना ही नहीं यदि विद्यार्थियों में इन गुणों का विकास नहीं हुआ तो व्यक्ति एवं चरित्र-निर्माण का उद्देश्य तो अपूर्ण रहेगा ही, समाज-कल्याण का लक्ष्य भी ध्वस्त हो जाएगा। ऐसे में कोई समाज भौतिक रूप से भले ही संपन्न हो जाए लेकिन उसमें विसंगतियाँ हमेशा के लिए जड़ जमा लेंगी। डिजिटल या ऑनलाइन शिक्षण पद्धति से विद्यार्थी सूचनाओं का आदान-प्रदान एवं ज्ञान तो प्राप्त कर सकते हैं, किंतु सामाजिक व व्यावहारिक ज्ञान से वे पूर्णतया वंचित हो जाएँगे। ऐसा इसलिए है, क्योंकि ज्ञान उत्पादन और ज्ञानार्जन के दो स्वरूप होते हैं- 

सैद्धांतिक ज्ञान एवं प्रायोगिक ज्ञान। साधारण शब्दावली में इसे किताबी ज्ञान एवं व्यावहारिक ज्ञान कहा जाता है। इसमें एक का आधार पुस्तकें, शिक्षकों के व्याख्यान आदि होते हैं, वहीं दूसरे का आधार लोकाचार या लोक-व्यवहार होता है। इसके अतिरिक्त ज्ञानार्जन का उद्देश्य विद्यार्थियों में संवेदना का विकास करना होता है और वहीं संवेदना उनमें लोक-व्यवहार का ज्ञान पैदा करती है। साहित्यिक शब्दावली में इसे ‘ज्ञानात्मक संवेदना’ और ‘संवेदनात्मक ज्ञान’ कहा जाता है। ज्ञान जब संवेदना से और संवेदना जब ज्ञान से संपृक्त होते हैं, तभी जाकर शिक्षा-दीक्षा या ज्ञानार्जन का वास्तविक उद्देश्य पूर्ण होता है और व्यक्ति अपने राष्ट्र और उसमें कायम सामाजिक संरचना के सुदृढ़ीकरण एवं प्रगति के योग्य बन पता है। ज्ञान और संवेदना के संगम के कारण ही वह पारिवारिक, सामाजिक व मानवीय संबंधों की गहराई को आत्मसात कर पाता है। ‘कोरोना’ संकट के इस दौर में यंत्र आधारित डिजिटल या ऑनलाइन शिक्षण पद्धति देश के विद्यार्थियों व युवा पीढ़ी को ज्ञान और संवेदना के इस संगम से तथा ज्ञानार्जन के वास्तविक उद्देश्यों से दूर कर रही है। डिजिटल या ऑनलाइन शिक्षण के यंत्र-जाल में फँसा कर उन्हें यांत्रिक कारागार में कैद कर रही है। 

परंपरागत कक्षा-कक्ष-शिक्षण, शिक्षणेतर गतिविधियों एवं अन्य अनेक क्रियाकलापों में लंबे समय से अभ्यस्त आज के विद्यार्थी व युवा इस ‘कोरोना’ काल में ‘कोरोना’ वायरस के साथ-साथ इस डिजिटल वायरस रूपी दोहरी महामारी का सामना कर रहे हैं। इसके कारण उनके मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य पर बेहद नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है जिसका परिणाम विद्यार्थियों या युवा पीढ़ी के नौजवानों के मानसिक अवसाद में जाने व उनके द्वारा आत्महत्या जैसे कदम उठाने के रूप में सामने आ रहा है। इतना ही नहीं, यदि हमने परंपरागत शिक्षण पद्धति को दरकिनार कर डिजिटल या ऑनलाइन शिक्षण पद्धति को विकल्प के रूप में अपनाए रखा तो यह कदम भविष्य में भारत जैसे राष्ट्र व भारतीय समाज के लिए बेहद खतरनाक साबित होगा। क्योंकि इस शिक्षण पद्धति से निकले विद्यार्थी व युवा एक नागरिक के रूप में परंपरागत सामाजिक ताने-बाने, उसके कायदे-कानूनों, रीति रिवाजों, आचार-व्यवहार, तौर-तरीकों एवं समाजीकरण की प्रक्रिया के निमित्त सर्वथा अयोग्य होंगे और उनमें न चाहते हुए भी अपराध की प्रवृत्ति बढ़ेगी। वे यंत्र आधारित इस शिक्षण पद्धति से केवल सैद्धांतिक ज्ञान प्राप्त करने एवं उसमें अभ्यस्त होने के कारण समाज-जीवन में लोगों के साथ यांत्रिक व संवेदनहीन व्यवहार करेंगे। इसका परिणाम यह होगा कि वे समाज में कायम मानदंडों के अनुरूप दंड के पात्र बनेंगे। यह उनके साथ घोर अन्याय होगा। लिहाजा इस ‘कोरोना’ संकट के कारण ‘यांत्रिक कारागार में कैद होती आज की युवा पीढ़ी के भविष्य को लेकर गंभीर चिंता करने की आवश्यता है। 

 

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