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प्रो. रसाल सिंह अधिष्ठाता, छात्र कल्याण, जम्मू केन्द्रीय विश्वविद्यालय 

किसी भी व्यक्ति का उत्थान या उन्नति तभी संभव होती है, जबकि आर्थिक के साथ-साथ उसकी आत्मिक उन्नति भी हो। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि किसी राष्ट्र की उन्नति की कसौटी क्या हो सकती है? कदाचित् किसी राष्ट्र की उन्नति भी उसकी आत्मिक-उन्नति पर निर्भर है। भारत की उन्नति के विषय में चिंतन करने से पहले भारत की आत्मा का बोध आवश्यक है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय इसके लिए ‘चिति’ और ‘विराट’ जैसे सांस्कृतिक पदों का प्रयोग करते हैं। शताब्दियों से हम यह सुनते आ रहे हैं कि भारत ‘गाँवों का देश’ है। कृषि-व्यवस्था उसका मेरुदंड है। मार्कंडेय पुराण’ में भारत के गाँवों के विषय में कहा गया है कि- ‘जहाँ कृषि कार्य किया जाता है, एवं जहाँ कृषि क्षेत्र समूह है, वह गाँव है। इस प्रकार यह निश्चित हो जाता है कि भारत के गाँव ही उसकी आत्मा हैं। महात्मा गाँधी भी कहा करते थे कि वास्तविक भारत का दर्शन गाँवों में ही सम्भव है, जहाँ भारत की आत्मा बसी हुई है। अतः भारत राष्ट्र के उत्थान या उसकी आत्मिक-उन्नति को उसके ग्राम्य-जीवन की उन्नति, उसके ग्रामीण समाज की उन्नति से ही जाँचा-परखा जा सकता है। ग्राम्य-जीवन की उन्नति को ही हम आधुनिक शब्दावली में ‘ग्राम विकास’ कहते हैं। ग्राम विकास’ का अर्थ ‘ग्राम्य-जीवन का चहुंमुखी विकास’ माना जाना चाहिए। ग्राम विकास की अवधारणा उस विकास की ओर संकेत करती है जहाँ ग्रामीणजनों का केवल सामाजिक-आर्थिक विकास ही न हो, अपितु शारीरिक, मानसिक और नैतिक विकास भी संभव हो। जब गांव और ग्रामीणजन स्वावलंबी बनें। जहाँ न सिर्फ सबके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य एवं रोजगार के अवसर हों, बल्कि समरसता और सौहार्द का वातावरण भी हो। विश्व बैंक ने ग्राम विकास की आधुनिक परिभाषा देते हुए कहा है कि वह व्यूह रचना जहाँ ग्रामीण जनता का सामाजिक एवं आर्थिक विकास हो, ग्रामीण विकास कहलाता है। राबर्ट चेम्बर्स के अनुसार, ‘ग्रामीण विकास एक पद्धति है; जिसके द्वारा ग्रामीण क्षेत्र के निर्धन और गरीब लोगों की सहायता की जाती है, जिससे अधिक लाभों की पूर्ति और नियंत्रण से ग्रामीण विकास हो सके। लघु कृषक, सीमांत कृषक, खेतिहर मजदूर और श्रमिक वर्ग के लोग इसमें शामिल किए जाते हैं। सियर्स कहते हैं कि ‘ग्रामीण विकास आर्थिक क्षेत्र के सभी पहलुओं में अधिक उत्पादन प्राप्त करता है। इस उत्पादन का जनसंख्या के अधिक लोगों में इस प्रकार वितरण सुनिश्चित करना जिससे वे जीवन में गुणवत्ता उत्पन्न कर सकें। यह मानव व्यक्तित्व की क्षमता की अनुभूति है।’ रोजर्स की धारणा है कि ‘ग्रामीण विकास एक प्रकार का सामाजिक परिवर्तन है जिसमें ग्रामीण सामाजिक प्रणाली में नए विचार प्रस्तावित कर आधुनिक उत्पादन विधि और उन्नत सामाजिक संगठन के प्रति व्यक्ति अधिक आय और उच्च जीवन स्तर उत्पन्न हो।’ इन परिभाषाओं में अधिक बल आर्थिक-विकास पर दिया गया है। ये परिभाषाएँ पश्चिमी देशों की ग्राम विकास की संकल्पना को सामने रखती हैं। किंतु एक प्रश्न है कि क्या हम इन संकल्पनाओं के आधार पर भारत के ग्राम विकास की रूपरेखा तय कर सकते हैं? निश्चित रूप से इसका उत्तर नकारात्मक है। इसका कारण यह है कि ग्राम विकास की इन परिभाषाओं में राष्ट्रोत्थान की बहु-आयामी संकल्पना का अभाव है। पश्चिम की अवधारणाएँ खंडित विचारों को महत्त्व देती हैं। तदनुसार ग्राम विकास की इन परिभाषाओं में समग्र,संतुलित और सतत विकास की भावना सन्निहित नहीं है। 

भारत के संदर्भ में ग्राम विकास की संकल्पना को समझना है, तो निश्चित रूप से हमें महात्मा गाँधी के ‘ग्राम-स्वराज’ की अवधारणा, पंडित दीनदयाल उपाध्याय की ‘अंत्योदय’ की संकल्पना व एकात्म मानव-दर्शन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आत्मनिर्भर भारत परियोजना को समझकर उन पर अमल करना होगा। हम यदि विकास के मूलतत्व को गहराई एवं गंभीरता से समझने का प्रयत्न करें, तो हम पाते हैं कि विकास का अर्थ केवल आर्थिक सशक्तीकरण नहीं है। केवल भौतिक सुख-सुविधाएँ एकत्रित करने मात्र से हम विकसित नहीं कहे जा सकते। यदि औपनिवेशिक शासन से पहले के ग्रामीण जीवन का अध्ययन किया जाए, तो हम आज की और पूर्ववर्ती जीवन-शैली और जीवन-स्तर को समझ सकेंगे। आज भले ही ढाँचागत विकास ने अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया है, किन्तु प्राचीन काल में सहभागिता और समरसता अर्थात् एक-दूसरे का सहयोग कर कार्य संपादित करने की सहकार-प्रवृति ग्रामीण समाज की भावना एवं संवेदना का प्राणीभूत तत्त्व थी। वह कृषि कार्य हो, कोई सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजन हो, या अपने प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग-उपभोग या प्रबंधन अथवा संरक्षण का कार्य हो, ग्रामीण लोग सामूहिक रूप से इन कार्यों को संपन्न किया करते थे। यही नहीं, उनकी अपनी सामाजिक संस्थाओं में न्याय की व्यवस्था भी शामिल थी, जिस पर उनकी गहरी आस्था थी। किंतु धीरे-धीरे लोगों में विकास की अवधारणा बदलने लगी और लोगों की आवश्यकताएँ धीरे-धीरे बढ़ने लगी। उनका झुकाव भौतिक विकास की ओर होने लगा। अब विकास का अर्थ लंबी-लंबी सड़कों का संजाल, बड़े-बड़े बाँध, पॉवर हाउस, बड़ी-बड़ी गगनचुम्बी इमारतें और अत्याधुनिक सुख-सुविधा के तमाम साधनों के संचय आदि से माना जाने लगा है। सम्पूर्ण विश्व में विकास के नाम पर ढाँचागत भौतिक विकास की अंधदौड़ प्रारंभ हो गई है। इस दौड़ में मानव का सर्वांगीण विकास कहीं विलुप्त हो गया है। वास्तव में, ढाँचागत विकास ही सम्पूर्ण विकास नहीं है, अपितु यह विकास का केवल एक पहलू है। विकास का वास्तविक अर्थ केवल लोगों को आर्थिक अवसर प्रदान करने का नाम भी नहीं है। केवल निर्धनता समाप्त कर देने या दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर देना मात्र ही संपूर्ण विकास नहीं हो सकता है। इसी प्रकार आर्थिक विकास भी विकास का एक आयाम ही है। सतत् एवं संतुलित विकास के लिए यह आवश्यक है कि विकास का केन्द्र-बिन्दु मानव हो । मानव के अन्तर्निहित गुणों व क्षमताओं का विकास कर उनके अस्तित्व, क्षमता, कौशल व ज्ञान को मान्यता देना, उन्हें अपने अधिकारों एवं कर्त्तव्यों के प्रति जागरूक करना, लोगों की सोचने-समझने व उनकी रचनात्मक शक्ति को बढ़ाना, उनमें उनके परिवेश एवं वातावरण का विश्लेषण करने की क्षमता जाग्रत करना, समाज में उनको उनकी पहचान दिलाना व उन्हें सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक सशक्तता के अवसर प्रदान करना ही वास्तविक विकास कहा जा सकता है। किंतु, इन समस्त प्रक्रियाओं के साथ-साथ मानव व प्रकृति के बीच उचित सामंजस्य व संतुलन बनाना विकास की पहली शर्त है। वास्तविक विकास केवल वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति करना ही नहीं है अपितु भविष्य की 

आवश्यकताओं पर भी ध्यान देना है। राष्ट्रोत्थान की संकल्पना को विकास के इन सोपानों से ही साकार किया जा सकता है। ये समस्त विचार गाँधी 

और दीनदयाल जी के ग्राम विकास के चिंतन में समाहित हैं। नि:संदेह भारत गाँवों का देश है। भारत की अधिकतम जनता गाँवों में निवास करती है। इस आत्मा की उन्नति या उत्थान ही सच्चे अर्थों में राष्ट्रोत्थान के संकल्प को पूरा कर सकता है। सदियों से भारत के गाँव उन्नत और समृद्ध रहे हैं। ग्रामीण कृषक कृषि पर गर्व का अनुभव करते थे और संतुष्ट थे। इसीलिए कहावत भी बनी-‘उत्तम खेती, मध्यम बान, अधम चाकरी भीख समान’ गाँवों में छोटा-मोटा व्यापार और लघु/ कुटीर उद्योग फलते– फूलते थे। लोग सुखी और संपन्न थे। भारत के गाँवों में स्वर्ग बसता था। इसीलिए हिंदी के राष्ट्रकवि ग्राम्य-जीवन की महिमा का वर्णन करते हुए बरबस लिख बैठते हैं- ‘अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है, क्यों न इसे सबका मन चाहे। थोड़े में निर्वाह यहाँ है, ऐसी सुविधा और कहाँ है?’ हालाँकि, वे अपनी कविता में ‘जगती कहीं ज्ञान की ज्योति, शिक्षा की यदि कमी न होती’ कहकर ग्राम्य-विकास में शिक्षा के अभाव की अड़चन को रेखांकित करना भी नहीं भूलते। समयांतराल में विकास की सारी नीतियाँ नगर विकास पर केंद्रित होती गईं और गाँव पिछड़ते गए। भारत के गाँवों की दशा अब दयनीय है। इसका मुख्य कारण केवल अशिक्षा ही नहीं, अपितु ग्राम विकास की हवाई आधुनिक अवधारणाएँ और नीतियाँ भी हैं। अशिक्षित होने के कारण ग्रामीण लोगों में अत्यधिक अंधविश्वास और रूढ़िवाद तो हैं ही जो ग्राम विकास में बाधा हैं, इसके अतिरिक्त पिछले सत्तर वर्षों की ग्राम विकास की सरकारी नीतियों ने भी गाँवों और ग्राम्य-जीवन को रसातल में पहुँचा दिया है। आज भी गाँवों में साहूकारों, जमींदारों और व्यापारियों का अनावश्यक दबदबा है। किसान प्रकृति पर निर्भर करते हैं और ‘दैव-मातृका कृषि’ पर निर्भरता के कारण सदैव सूखा तथा बाढ़ की चपेट में आकर नुकसान उठाते रहते हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ‘अदैवमातृका कृषि’ अर्थात सिंचाई की व्यवस्थायुक्त कृषि के हिमायती थे। महँगी ब्याज दर के ऋण में फँसे, तंगी में जीते, छोटे-छोटे झगड़ों को निपटाने के लिए कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाते हुए ये अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं या फिर आत्महत्या कर बैठते हैं। गाँव में कृषि कार्य पर पूरी तरह निर्भरता अब पूरे परिवार की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाती। जनसंख्या के बढ़ाव से जोत निरंतर छोटी हो रही हैं। अत: उनमें कृषि के आधुनिक साधनों का प्रयोग नहीं हो पाता। गाँववासी भी अब नगरों की चकाचौंध से प्रभावित होने लगे हैं। ग्रामीण युवा अब गाँवों में नहीं रहना चाहता। वह शिक्षा, नौकरी और सुख-सुविधाओं का पीछा करते हुए नगर पहुँचना चाहता है। विस्थापन भारत के ग्राम विकास और राष्ट्रोत्थान में गंभीर समस्या है। महात्मा गाँधी ने इन समस्याओं को बहुत पहले ही भाँप लिया था। यही कारण है कि उन्होंने ‘ग्राम-स्वराज’ की संकल्पना प्रस्तुत की। 

गाँधी जी ने अपनी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ में ‘ग्राम-स्वराज’ को लेकर गंभीर चिंतन किया है। उनके प्रिय विषय थे सांप्रदायिक सद्भाव, राष्ट्रीय एकता, ग्राम विकास, शिक्षा, लघु उद्योग, हस्तशिल्प, खादी, प्राकृतिक चिकित्सा, कृषि विकास, नशाबंदी, राष्ट्र भाषा के रूप में हिंदी तथा विकेन्द्रित हत जो ग्राम्य जीवन के विकास की अवधारणा प्रस्तुत की वह राष्ट्रोत्थान की कुंजी है। दुर्भाग्य है कि हमने इस कुंजी से ग्राम विकास में आने वाली समस्या रूपी ताले को अब तक न खोलने का प्रयत्न किया है। आज हम जिस संक्रमण काल से गुजर रहे हैं ।

और राष्ट्रोत्थान के लक्ष्य के सामने जो भयावह एवं विषम परिस्थितियाँ और चुनौतियाँ हैं, ऐसे में गाँधी के विचारों की अनदेखी नहीं की जा सकती। ग्रामीण अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में गाँधी जी ने विकेंद्रीकरण, आत्मनिर्भरता, स्वदेशी, सीमित उत्पादन और संयमित उपभोग, ग्राम-शिल्प एवं लघु उद्योगों को प्रोत्साहित करने की देशज दृष्टि दी। उनकी धारणा थी कि उत्पादन और सेवा-संसाधनों का उपयोग व्यक्तिगत उपभोग के लिए नहीं, अपितु सभी की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया जाना चाहिए । गाँधी जी ने जिस स्वावलंबी, सशक्त और समरस ग्रामीण भारत का सपना संजोया था, उसमें सभी के लिए काम, रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छ जल, सर्वोदय एवं सद्भाव की चिंता थी। गाँधी जी चाहते थे कि हर गाँव में खेती हो, किसान हों, बढ़ई हों, कुम्हार हों, सूत कातने वाले हों, दर्जी हों, तेल पेरने वाले हों ताकि ग्रामवासियों को अपनी आवश्यकताओं की वस्तुएँ लेने के लिए बाहर न जाना पड़े या बड़े-बड़े देशी-विदेशी कॉर्पोरेट घरानों या एजेंटों पर निर्भर न होना पड़े। गाँधी जी का मानना था कि आर्थिक प्रणाली ऐसी होनी चाहिए जिससे प्रत्येक व्यक्ति को रोजगार का अवसर प्राप्त हो, किसानों को उनकी फसलों का उचित मूल्य मिल सके, मजदूर अपने गाँवों को छोड़कर प्रवासी बनने के लिए बाध्य न हों। महात्मा गाँधी ने इन समस्याओं के प्रति लोगों का ध्यान निरंतर ‘स्वदेशी’ आन्दोलन के माध्यम से खींचने का प्रयत्न किया है। गाँधी जी निरंतर इस बात पर बल देते थे कि भारत की आत्मा भारत के गाँव हैं। अतः भारत का विकास अर्थात् राष्ट्रोत्थान की संकल्पना गाँवों के विकास से ही संभव हो सकती है। इसलिए आवश्यकता है सरकार के ग्रामीण विकास की नीतियों एवं अर्थनीतियों में उस तालमेल की जो गाँधी जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित स्वदेशी, स्वावलंबन और स्वशासन के सिद्धांतों से मेल खाती हों। गाँधी जी और पंडित जी की ग्राम विकास की अवधारणा श्रम को महत्त्व देती है। भारत की प्रमुख समस्याओं जैसे बेकारी और अर्द्ध-बेकारी के संदर्भ में उन्होंने श्रम-क्षमता व श्रम-साधनों, रोजगार के अवसरों की आवश्यकता पर बल दिया है। वे श्रम को सम्मान की दृष्टि से देखते थे और उनकी धारणा थी कि प्रत्येक व्यक्ति को श्रम करना चाहिए। व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनिवार्यतः शारीरिक श्रम करना चाहिए। अकर्मण्य और आश्रित होना सबसे बड़ा पाप है। उनका दृढ़ मत था कि जब तक भारत के गाँवों की दशा ठीक नहीं होगी, तब तक राष्ट्र शक्तिशाली नहीं हो सकता। राष्ट्रोत्थान नहीं हो सकता। वे गाँवों की दशा सुधार कर पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति का सशक्तीकरण करना चाहते थे। उसे मुख्यधारा में सम्मिलित करना चाहते थे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी गाँधी जी के ग्राम-स्वराज’ की अवधारणा से बेहद प्रभावित थे। यही कारण है कि उन्होंने भी ग्राम विकास के संदर्भ में सबसे अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की चिंता करते हुए अन्त्योदय’ और ‘ग्रामोदय’ की संकल्पना प्रस्तुत की ताकि भारत को एक समर्थ व सशक्त राष्ट्र बनाया जा सके। उनके अनुसार, ‘अन्त्योदय’ का अर्थ है- ‘समाज / राष्ट्र के सबसे निचले पायदान पर स्थित व्यक्ति का विकास। निचले पायदान पर स्थित सभी व्यक्तियों का संतुलित रूप से विकास जिससे राष्ट्रीय कल्याण में उनकी सहभागिता सुनिश्चित हो सके। वह अपने पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करने में सक्षम बन सके।’ गाँधी जी की भांति उनकी भी धारणा स्पष्ट थी कि भारत गाँवों का देश है जिसकी अधिक आबादी गाँवों में निवास करती है। इसलिए देश की इस ग्रामीण जनता के समग्र उत्थान के बिना एक उन्नत राष्ट्र के रूप में भारत कभी स्थापित नहीं हो सकता। आजतक भी प्राकृतिक आपदाओं (बाढ़, सूखा आदि) के फलस्वरूप किसानों को भारी क्षति उठानी पड़ती है और 

फसल नष्ट हो जाने पर वे आत्महत्या करने को विवश हो जाते हैं। आज भी भारत के किसानों की स्थिति यह है कि वह अपने खून-पसीने से सींची गयी फसल की लागत भी नहीं निकाल पाते और सरकारों से न्यूनतम समर्थन मूल्य प्राप्त करने के लिए संघर्षरत हैं । गाँधी जी और दीनदयाल जी को भारतीय किसानों के भविष्य को लेकर गंभीर चिंता थी। यही कारण है कि दोनों ने अपनी अपनी संकल्पनाओं में भारत के गाँवों के विकास को भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप कार्यान्वित करने की पहल की है। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि पिछली सरकारों द्वारा निरंतर इन दोनों के चिंतन को नकारा गया और ग्राम विकास की उथली योजनाएं लागू कर उन्नत परिणाम की अपेक्षा की गयी। आज स्थिति यह है कि आज भी भारत के गाँवों में बसने वाला, किसान, खेतिहर-मजदूर और आम ग्रामीण, युवा-बेरोजगार स्वतंत्र भारत के सुनहले सपने की परिधि में शामिल नहीं है। गाँधी जी ने भारत के आर्थिक जीवन में गाँवों के महत्त्व को रेखांकित करते हुए कहा था कि ‘जनसंख्या का अस्सी प्रतिशत हिस्सा जो हमारे खेतों में काम कर रहा है तथा जिसे व्यवहारतः साल में कम से कम चार महीने के लिए कोई काम नहीं है और जो भुखमरी की सीमा रेखा पर जी रहा है, उसे कृषि के पूरक के रूप में कम से कम चार महीने सरल उद्योग की आवश्यकता होगी। यही कारण है कि उन्होंने गाँवों में लघु एवं कुटीर उद्योगों की स्थापना पर बल दिया ताकि कोई भी खेतिहर मजदूर भुखमरी का शिकार न हो और इन उद्योगों में रोजगार पाकर वह अपनी खेती पर भी ध्यान दे सके। इतना ही नहीं, शहर गाँवों के शोषक न बन जाएँ, इसके लिए गाँधी जी ने ‘ग्रामवाद’ की अवधारणा भी सामने रखी। उन्होंने कहा कि गाँवों को ‘मेरी योजना के अंतर्गत शहरों द्वारा उन चीजों का उत्पादन नहीं करने दिया जाएगा जिन्हें गाँव उतने ही अच्छे ढंग से उत्पादित कर सकते हैं। शहरों का उचित कार्य यह होता है कि वे गाँव की वस्तुओं को उठाने के लिए कार्य करें। हमारे सामने गुजरात में ‘अमूल’ सहकारी-उत्पादन का एक आदर्श उदाहरण है जहाँ किसान महिलाओं ने पूरे भारतवर्ष में ही नहीं, विदेशों में भी अपना लोहा मनवा दिया है। किंतु, वर्तमान में शहर और गाँवों के मध्य कितना असंतुलन है, यह बात सबके समक्ष है। दूध, सब्जियाँ, अनाज आदि अनेक वस्तुओं का उत्पादन कर ग्रामीण कृषक जब शहरों में अपनी वस्तुएँ बेचने जाते हैं तो उन्हें उचित मूल्य प्राप्त नहीं होता। बिचौलियों के शोषण और शहरी समाज की उदासीनता चिंता और चिन्तन का विषय है। यही कारण है कि गाँधी जी यह चाहते थे कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था यथासंभव आत्मनिर्भर हो। उत्पादन और उपभोग का विकेंद्रीकरण हो । ग्रामीण और मंडियों के बीच सन्निकट व्यक्तिगत संबंध कायम हों। भारत के गाँवों में प्रशिक्षण, शोध तथा विकास के कार्यक्रम, तकनीकी सहायता, प्रोत्साहन आदि को छोड़कर ग्रामीण किसान, खेतिहर-मजदूर सरकार पर कम से कम निर्भर रहें और कार्य की व्यवस्था के लिए सहकारी संस्थाओं का गठन किया जाए। गाँधी जी का विचार था कि केवल उत्पादन में अभिवृद्धि और उसके उचित वितरण मात्र से ही समस्या नहीं सुलझ सकती; अपितु गाँवों के सर्वांगीण विकास पर जोर दिया जाना चाहिए। उनका मानना था कि गाँवों में गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम का प्रभाव तभी स्थाई हो सकेगा जब समग्र सेवा को ग्रामोद्योग या ग्राम पुनर्निर्माण के व्यापक कार्यक्रम के एक अंग के रूप में चलाया जाता है। यह तभी संभव है जब किसी विशेष क्षेत्र और वहाँ के रहने वाले लोगों का विकेंद्रित आर्थिक विकास हो। इसी को गाँधी जी ‘समग्र सेवा’ मानते थे। वे संपूर्ण ग्रामीण अर्थव्यवस्था का नए आधार पर पुनर्गठन और गाँवों का पुनर्निर्माण करना चाहते थे। आज भारत को यदि एक उन्नत राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान बनानी है तो सरकार को अपनी ग्राम विकास की योजनाओं में गाँधी जी और पंडित जी के इन विचारों को अपनाना ही पड़ेगा। क्योंकि गाँवों का उत्थान होगा, तभी राष्ट्रोत्थान होगा। एक सच्चे, सार्थक और सशक्त लोकतंत्र का अर्थ है सबकी सार्थक भागीदारी। लोकतंत्र का संबंध उत्तरदायित्व से भी है। जीवंत और सशक्त स्थानीय शासन सबकी सक्रिय भागीदारी और उद्देश्यपूर्ण उत्तरदायित्व को सुनिश्चित करता है। इसी विचार को केंद्र में रखकर गाँधी जी ने अपनी ‘ग्राम-स्वराज’ की अवधारणा में भारत के गाँवों में पंचायती राज या स्थानीय शासन व्यवस्था स्थापित करने की वकालत की थी। गाँधी जी का मानना था कि जो कार्य स्थानीय स्तर पर संपादित किए जा सकते हैं, उन कार्यों को उस ग्रामीण क्षेत्र के स्थानीय लोगों एवं उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथ में दे देना चाहिए। एक लोकतंत्र के सशक्तीकरण के लिए भी ऐसा किया जाना अत्यंत अनिवार्य है। प्रादेशिक अथवा केंद्र सरकार से कहीं अधिक परिचित या सहज गाँवों की आम जनता स्थानीय शासन और प्रतिनिधियों से होती है। स्थानीय शासन क्या कर रहा है और क्या करने में असफल रहा है। आम जनता का इस प्रश्न से कहीं अधिक सरोकार होता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इस बात का सीधा प्रभाव उसके दैनंदिन जीवन पर पड़ता है। इस प्रकार स्थानीय शासन को शक्तिशाली और अधिकार संपन्न बनाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अधिक शक्तिशाली व सर्व-समावेशी बनाने के समान है। यही कारण है कि संविधान में 73वाँ संशोधन कर त्रि-स्तरीय पंचायती राज को लागू भी किया गया। किंतु आज यह व्यवस्था गाँवों को सशक्त बनाने व ग्राम विकास में कितनी सहायक हो रही है और अभी क्या करने की आवश्यकता है, इसका सामयिक मूल्याङ्कन होते रहना चाहिए। तभी जाकर हम ग्राम विकास और राष्ट्रोत्थान की संकल्पना को मूर्त रूप प्रदान कर सकते हैं। 

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