प्रो. प्रकाश चंद्र अग्रवाल, प्राचार्य, क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान, भुवनेश्वर (ओडिशा)
स्वदेशी दो शब्दों से मिलकर बना है स्व जिसका अर्थ है स्वयं का /निज का। तथा देशी का अर्थ है देशज अर्थात् देश में बनने या निर्मित होने या जन्म लेने वाला/ वाली। इस प्रकार से स्वदेशी का अर्थ हुआ कि किसी निश्चित भूभाग में निर्मित, कल्पित, कोई नीति, विचार, सिद्धांत या किसी वस्तु को स्वदेशी की संज्ञा दी जा सकती है। इस प्रकार से जिन वस्तुओं का निर्माण निज या स्वयं के देश में होता है उनको हम स्वदेशी कहते हैं। हमें स्वदेश तथा स्वदेशी चीजों से प्यार होना चाहिए। जहाँ हम जन्म लेते हैं, प्रकृति की संपदा के बीच पलते बढ़ते हैं, वह हमारी जन्मभूमि, कर्मभूमि है और उसे ही हम अपना देश अर्थात् स्वदेश मानकर उससे प्रेम का गहरा संबंध जोड़ लेते हैं। यह प्रेम स्वत: उपजता है, उसके लिए किसी शिक्षण अभ्यास की जरूरत नहीं होती है। देश आज की धारणा में राष्ट्र की एक इकाई के रूप में सामने आता है। राष्ट्र में देश अर्थात् भूमि-प्रदेश के साथ वहाँ का जन-समुदाय और उनकी संस्कृति का योग भी रहता है। स्वदेश-प्रेम इसी राष्ट्र-प्रेम का रूप है जिससे उसके प्रति गहरा अनुराग और गौरव का भाव सदा विद्यमान रहता है। देश-प्रेम का तकाजा है कि हम सदा उसके गौरव की रक्षा करें और उसके विकास में यथाशक्ति योगदान दें। जो मनुष्य-जन्म लेकर भी अपने देश से प्यार नहीं करता, उसका तो जीना भी व्यर्थ है, यथा जिसको न निज गौरव तथा –
देश का अभिमान है। वह नर नहीं, पशु है निरा,
और मृतक समान है। किसी देश का आत्मनिर्भर होना उसके स्वदेशीपन को दिखाता है। जो देश जितना अधिक आत्मनिर्भर है वह उतना अधिक विकसित होगा, इसलिए आज के दौर में आत्मनिर्भर होना देश की परिपक्वता तथा मजबूती का पर्याय है। आज के वैश्विक परिवेश में जहाँ उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण की वजह से दुनिया की अधिकाधिक कंपनियाँ अपने उत्पादों को बेचने के लिए भारतवर्ष को अधिक जनसंख्या की वजह से दुनिया का सबसे बड़ा बाजार मानती हैं। इस कारण से प्रतिस्पर्धा के दौर में हमारे कल-कारखाने, कुटीर उद्योग, कृषि उत्पाद तथा लघु-उद्योग आदि को वैश्विक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। यदि हम मिलकर अपने स्वदेश प्रेम तथा स्वदेशी उत्पादों के प्रति अपनी धारणा नहीं बदलेंगे और आत्मनिर्भर नहीं बनेंगे तो आज के दौर में हम तथा हमारा देश न सिर्फ इस प्रतिस्पर्धा में बहुत पीछे रह जाएगा बल्कि बहुत सारा हमारा धन भी विदेशों में जाएगा परिणामतः हमको एक बार फिर से बेरोजगारी, भुखमरी, पिछड़ेपन की त्रासदी के दौर से गुजरना पड़ेगा। अतः स्वेदशी जागरण अभियान ।
आज के समय की मूलभूत आवश्यकता है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बंग-भंग विभाजन के समय से जनजागरण के द्वारा स्वदेशी आंदोलन को बहुत बल मिला। परंतु स्वदेशी का इतिहास इससे भी पुराना है। यद्यपि भारत में स्वदेशी का पहले-पहल नारा बंकिमचंद्र चटोपाध्याय ‘बंगदर्शन’ में विज्ञानसभा का प्रस्ताव रखते हुए दिया था। उन्होंने कहा था- ‘जो विज्ञान स्वदेशी होने पर हमारा दास होता है, वह विदेशी होने के कारण हमारा प्रभु बन जाता है।’ जुलाई सन् 1903 में ‘सरस्वती’ पत्रिका में ‘स्वदेशी वस्त्र का स्वीकार’ नामक शीर्षक से एक कविता छपी। जिसकी वजह से स्वदेशी जागरण को और बल मिला इस कारण से हमारे देश के मनीषियों, स्वाधीनता संग्राम के सिपाहियों, महापुरुषों ने स्वदेशी जागरण की पुरजोर वकालत की। इस क्रम में महात्मा गांधी, अरविंद घोष, रवीद्रनाथ ठाकुर, वीर सावरकर, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, और लाला लाजपतराय आदि स्वदेशी आंदोलन के प्रमुख उद्घोषक बने। आगे चलकर यही आंदोलन महात्मा गांधी के स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र-बिंदु बन गया उन्होंने इसे ‘स्वराज की आत्मा कहा।’ महात्मा गाँधी के
शी से मेरा मतलब भारत के कारखानों में बनी वस्तुओं से नहीं है। स्वदेशी से मेरा तात्पर्य भारत के बेरोजगार लोगों के हाथ की बनी वस्तुओं से है। शुरू में यदि इन वस्तुओं में कोई कमी भी रहती है तो भी हमें इन्हीं वस्तुओं का उपयोग करना चाहिए तथा स्नेहपूर्वक उत्पादन करने वालों से उसमें सुधार करवाना चाहिए। ऐसा करने से बिना किसी प्रकार का समय और श्रम खर्च किए देश और देश के लोगों की सच्ची सेवा हो सकेगी।’ इस प्रकार से स्वदेशी क्या है? (निम्न पंक्तियों द्वारा हम जानें।) स्वदेशी वस्तु नहीं-चिंतन का तरीका है। स्वदेशी मन्त्र है- सुख का। स्वदेशी शस्त्र है- युग क्रांति का। स्वदेशी कवच है- शोषण से बचने का। स्वदेशी सम्मान है- देश के श्रम का। स्वदेशी आंदोलन है- सादगी का। स्वदेशी आधार है- समाज सेवा का। स्वदेशी उपचार है- मानवता के पतन का। स्वदेशी उत्थान है- समाज व राष्ट्र का । इस प्रकार से भाषा, पहनावा, भेषज (औषधि), शिक्षा, रीति-रिवाज वस्तुओं कृषि न्याय, शासन व्यवस्था आदि में किसी भी देश को यदि आर्थिक, सामाजिक, तकनीकी, सुरक्षा आदि क्षेत्र में समर्थ व महाशक्ति बनना है तो स्वदेशी-मन्त्र को अपनाना ही होगा दूसरा कोई रास्ता नहीं। भारत वर्ष को आजादी भले 73 वर्ष पूर्व मिली परंतु जब तक हमारा देश हमारी जरूरतों के लिए विदेशों पर निर्भर रहेगा इसे पूर्ण आजादी नहीं कहा जा सकता है। इस कारण से आज के दौर में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की जरूरत फिर से महसूस होने लगी है। स्वावलंबन का अर्थ
आत्मनिर्भर होने की अवस्था, गुण, भाव, आत्मनिर्भरता, खुदमुख्तारी । स्वावलंबन का अर्थ है- स्व + आलंबन अर्थात् अपने ऊपर ही निर्भर रहना। स्वयं अपने भरोसे जीना, अपने जीवन के लिए शक्तियाँ स्वयं जुटाना। अपने लिए साधन स्वयं जुटाना इस प्रकार अपने ही भरोसे रहकर अपने बल पर काम करने की क्रिया। हिंदी में एक कहावत है ईश्वर उसकी मदद करता है जो स्वयं अपनी मदद करता है। अपने सहायक आप बनो, होगा सहायक प्रभु तभी बस चाहने से, सुख नहीं मिलता कभी । कर, पद, हृदय, दृग, कर्ण तुमको ईश ने सब कुछ दिया, है कौन ऐसा काम जो, तुमसे न जा सकता किया। इसलिए ‘रामचरित मानस’ में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है- कादर मन कहुँ एक अधारा । दैव-दैव आलसी पुकारा । अर्थात् जो कर्मठ नहीं जो अपने कर्म नहीं करता वही आलसी व्यक्ति दैव-दैव की पुकार ज्यादा करता है जबकि गीता में भगवान कृष्ण ने कम करने की बात कही है। फल की इच्छा नहीं रखने, निष्काम भाव से कर्म करने की बात पर जोर दिया है। हिंदी के महान कवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी कविता ‘उद्यमी नर’ में भाग्यवादी, नियतिवादी दृष्टिकोण का खंडन करते हुए उद्यमशीलता की सीख दी है और लिखा है – ब्रह्मा से कुछ लिखा भाग्य में मनुज नहीं लाया है, अपना सुख उसने अपने भुजबल से पाया है।
इसी प्रकार से बौद्ध दर्शन का भी एक सूत्र वाक्य है – अप्प दीपो भव अर्थात अपना दीपक खुद बनो। (अर्थात् अपने दीपक स्वयं बनो)
आत्मनिर्भर व्यक्ति जीवन का सच्चा सुख प्राप्त करता है। उसे दूसरों की ओर याचना भरी नजरों से देखना नहीं पड़ता। दूसरों से सहायता माँगना परतंत्रता है। परतंत्र व्यक्ति को अपनी आत्मा को दबाना पड़ता है। उसे अपनी इच्छाओं को अनसुना करना पड़ता है जबकि आत्मनिर्भर व्यक्ति या देश सच्चे अर्थों में स्वतंत्र होता है। वह अपनी इच्छा का स्वामी होता है। अत: व्यक्ति को परिश्रम करके आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करना चाहिए। प्रश्न उठता है कि क्या कोई व्यक्ति दूसरों की सहायता के बिना जी सकता है? उत्तर है- नहीं। वास्तव में आपसी संबंधों में लेन-देन संतुलित होना चाहिए। हम किसी से सहायता लेते हों तो उसकी सहायता करने में भी सक्षम हों। इसके लिए आवश्यक है कि हम किसी कार्य में दक्ष हों चाहे वह रक्षा-कार्य हो, सेवा-कार्य हो, या धन की समृद्धि हो। हम तन से, मन से, धन से या किसी तरह औरों के काम आ सकें। ऐसा व्यक्ति आत्मनिर्भर कहलाता है। वह किसी पर बोझ नहीं होता। इसके विपरीत पराधीन को सपने में भी सुख नहीं मिलता। ऐसा कहा जाता है कि पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं। स्वावलंबन या आत्मनिर्भरता ही वह कुंजी है जो मनुष्य के लिए सफलताओं के द्वार खोलती है। नित नई उपलब्धियों के मोती उसके जीवन में बिखरने लगते हैं। जीवन में उत्साह, उमंग का संचार होने लगता है तथा वह और अधिक इच्छा शक्ति से कर्मरत होने लगता है। बाधाओं के सेतु
शक्तियाँ विद्यमान है जिनके कारण वह आत्मनिर्भर बन सकता है। स्वावलंबी व्यक्ति को किसी दूसरे व्यक्ति के ऊपर प्रत्येक छोटी-छोटी बात के लिए निर्भर नहीं रहना पड़ता क्योंकि सुखमय जीवन के लिए अनिवार्य है कि मानव अपने बल पर अपने सपने साकार करे न कि उसका श्रेय किसी और को जाए। इसीलिए किसी विचारक ने उचित ही कहा है कि ‘सच्चा आनंद तो मुझे मेरे काम से मिलता है। मुझे अपना काम मिल जाए तो फिर स्वर्ग की प्राप्ति की भी इच्छा नहीं।’ स्वावलंबन मनुष्य और पशु के मध्य अंतर स्पष्ट करता है। मनुष्य का जीवन स्वतंत्रता है, परतंत्रता मृत्य के करीब का रास्ता है। सफलता सदा कर्मठ व्यक्ति का ही भाग्य उदय करती है। कायर, अकर्मठ, अनुत्साही और परमुखापेक्षी व्यक्ति तो सदा ईश्वर को पुकारता रहता और सदा यही कामना करता है कि – कुछ न करूँ मैं और कोई सब कर दे, ला के इष्ट वस्तु बस मेरे आगे धर दे, ऐसा क्लीव कापुरुष सबका सहेगा, शाप, भोग क्या करेगा, भाग्यवादी प्रवृत्ति मनुष्य को कहीं का नहीं छोड़ती है। आज सैकड़ों लोग ऐसे हैं जो दूसरों कि सहायता की प्रतीक्षा में बैठे रहते हैं और सोचते हैं कि चमत्कार होगा और बिना कुछ किए सब कुछ प्राप्त हो जाएगा। परिस्थितियाँ भी मनुष्य को आत्मनिर्भर होना सिखा देती हैं। कायर होते हुए भी वह जब वह जान लेगा कि कोई ऐसा नहीं है कि जो मेरी जीवन नैया को पार लगाएगा तो वह अपनी आंतरिक शक्तियों को संगठित कर अपनी ताकत लक्ष्य प्राप्ति में लगा देगा और असंभव कार्य भी दुनिया को कर दिखाएगा। एक बार एक बड़ी कंपनी के मालिक ने लोगों से कहा – ‘मैं अपने पुत्र को किसी दूसरे के यहाँ नियुक्त होते देखना चाहता हूँ ताकि वह कठिन परिस्थितियों से जूझने की शक्ति अपने भीतर पैदा करेगा। वहाँ उसकी सहनशक्ति और कुशलता विकसित होगी। अपनी कंपनी में उच्च पद देने से वह मुझ पर निर्भर रहेगा जिससे उसकी आंतिरक शक्तियों का विकास अधूरा रह जाएगा।’
स्वावलंबी व्यक्ति जब अपने परिश्रम के बल पर सफलता के जो पुष्प खिलाता है उसकी सुरभि से उसका अंग-प्रत्यंग महक उठता है, प्राप्य वस्तुएँ उसे अलौकिक आनंद प्राप्त कराती हैं, परावलंबी होने की पीड़ा और स्वावलंबी होने के सुख की स्पष्ट अनुभूति करवा देती है। स्वयं अर्जित किए गए धन के उपभोग करने में एक अकथनीय सुख की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में भी ऐसा कहा गया है- यत्नमसे निज कर्मोपातम्, वित्त विनोदय चित्तम । (अर्थात् स्वयं अर्जित किए गए धन का उपभोग करने में एक अकथनीय सुख की प्राप्ति होती है।) स्वावलंबन ही मनुष्य को रंक से राजा बना सकता है एवं जन साधारण को झोंपड़ी से महलों तक पहुँचा सकता है। हमारे समक्ष अनेक ऐसे उदाहरण हैं कालिदास जैसा मूढ़मति व्यक्ति महाकवि बन गया, नेपोलियन साधारण व्यक्ति से महान विजयी बना, एकलव्य आत्मबल के कारण ही बड़ा धनुर्धारी बना । असंभव शब्द मूल के शब्दकोश में होता है, बुद्धिमान तो संभव कर दिखाते हैं। वे राह ढूँढ़ लेते हैं या नई राहें बना लेते हैं। व्यक्ति से लेकर किसी राष्ट्र की स्थिति पर परावलंबन का बुरा असर होता है। दूसरे देशों पर पूर्णतः निर्भर देश पतन की गहरी खाई में गिरता है, तथा उत्थान के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं। स्वावलंबन एक ऐसा खजाना है जो नित नई संभावनाओं को जन्म देता है।
आत्मनिर्भरता में छुपा सफलता का बीज दृढ़ संकल्प सहायता करे, निराशा भला क्या चीज । स्वावलंबन का महत्त्व बहुत है ऐसा कहा जाता है कि स्वावलंबन की एक झलक पर कुबेर के खजाने का कोष भी न्योछावर है। हमारे शास्त्रों में तथा संस्कृत भाषा में ऐसा कहा गहा है कि – नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने। विक्रमार्जित स्तवस्व स्वमेव मृगेंद्रता।। (अर्थात् वन के जीवों द्वारा सिंह का न तो अभिषेक किया जाता है न ही कोई संस्कार होता है, बल्कि वह अपने पराक्रम से सब कुछ अर्जित कर राजा बनता है।) यह सच है कि स्वधीनता और कर्मठता स्वावलंबन की भावना या गुण ही मनुष्य की मनुष्यता का आधार है। स्वावलंबन के बहुत से फायदे हैं जैसे: अपनी क्षमताओं का विकास, दूसरों पर निर्भर न रहना, आत्मसम्मान की प्राप्ति, सुखमय जीवन, प्रगति का आधार, बेरोजगारी और अकाल से बचाव, इत्यादि। स्वावलंबन की आदत हमारे दिमाग में स्वतंत्र चिंतन, शीघ्र निर्णय की शक्ति भर देती है। और हम जिम्मेदार नागरिक होकर देश की प्रगति में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते हैं। विवेकानंद जी ने कहा था। ‘मुझे दस व्यक्ति दीजिए जिन्हें अपने में विश्वास हो और मैं समूचे विश्व की कायापलट कर दूंगा। इस प्रकार से परावलंबी सोच समाज और राष्ट्र को अपाहिज करती है, जबकि आत्मनिर्भरता अमृत का अक्षय स्त्रोत है।
राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त की लेखनी के अनुसार यह पापपूर्ण परावलंबी चूर्ण होकर दूर हो, फिर स्वावलंबन का हमें प्रिय पुण्य पाठ पढ़ाइए। स्वदेशी, स्वावलंबन और भारत की शिक्षा, शिक्षा समाज में बदलाव लाने का सशक्त माध्यम है। भारत वर्ष में प्राचीन से लेकर आधुनिक शिक्षा व्यवस्था ने सैद्धांतिक शिक्षा के साथ-साथ श्रम आधारित शिक्षा, रोजगारोन्मुखी शिक्षा, व्यावहारिक शिक्षा को हमेशा महत्त्व दिया है। पुराने समय में वैदिक युग में तथा आश्रमों और गुरुकुलों में श्रम को विशेष महत्त्व देते हुए कौशल आधारित शिक्षा पर पूर्ण बल दिया गया। आश्रम का अर्थ ही है- जहाँ सम्यक श्रम किया जाता हो। इसी प्रकार से महात्मा गाँधी की 1937 की वर्धा शिक्षा योजना जिसे बेसिक तालीम या बुनियादी शिक्षा के नाम से भी जाना जाता है उस योजना में भी व्यावहारिक ज्ञान व रोजगारपरक शिक्षा की बात कही गई जिसमें विद्यार्थियों को शिक्षा उनकी मातृभाषा में दिए जाने के साथ साथ दैनिक जीवन के कार्य जिसमें हस्तशिल्प तथा उत्पादक कार्य को बहुत महत्त्व दिया गया ताकि विद्यार्थी अपने जीवन में कुशल बनें और अपनी जीविकोपार्जन कर आत्मनिर्भर बनें जिससे हर क्षेत्र में स्वदेशी वस्तुओं के निर्माण को गति मिले तथा देश को कुशल कामगार मिलें। हमारे युवा रोजगार की खोज की जगह स्वरोजगार की दिशा में सोचकर आत्मनिर्भर बनें और देश के सकल घरेलू उत्पाद को बढ़ा कर देश को आर्थिक तौर पर मजबूती प्रदान करें। इसी क्रम में देश में बने मुदालियर आयोग (1952) ने व्यावसायिक शिक्षा पर बल दिया और देश में बहुउद्देशीय विद्यालय खोलने की बात कही ताकि विद्यार्थी अपनी रुचि के साथ पाठ्यक्रम का चुनाव करें और आत्मनिर्भर बनें। 1964 के भारतीय शिक्षा आयोग या कोठारी आयोग ने कार्यानुभव शिक्षा तथा विविधता वाले पाठयक्रम को शुरू करने की बात कही जिसमें हस्तशिल्प, गृह विज्ञान और प्रायोगिक शिक्षा की बात उल्लेखनीय है। 1968 में (अश्व) अगष्द्धठवष्ड्डद्य, श्वष्डह्रदशडद्य, श्वस्रह्वष्डद्वशठ अर्थात् तकनीकी शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा को सामान्य शिक्षा के साथ समाविष्ट करने पर जोर दिया गया। 1986 की शिक्षा नीति हो या 1992 की (वह) संशोधित नीति में भी व्यावसायिक शिक्षा पर बल दिया गया। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 ने शिक्षा के क्षेत्र में बहुत बदलाव किए जिसमें केवल सैद्धांतिक ज्ञान के रटने की बात को नकार कर उसकी जगह पुस्तकीय ज्ञान को बाहर की दुनिया से जोड़कर सीखने की बात कही गई और इसका कारण यह था कि विद्यार्थी बिना बोझ के अपनी रुचि के साथ खुशी-खुशी पढ़ाई करें और अपने अनुभव से सीखें। हमारे देश में व्यावसायिक शिक्षा को गति देने के लिए भोपाल में (ष्टदुश्व) केंद्रीय व्यावसायिक शिक्षा संस्थान की स्थापना की गई तथा केंद्र सरकार और राज्य सरकारों द्वारा समय-समय पर पॉलिटेक्निक, औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान खोले गए ताकि विद्यार्थियों में विभिन्न कौशलों का विकास हो सके। भारत सरकार द्वारा कौशल विकास मिशन का आरंभ भी आत्मनिर्भर भारत बनाने की दिशा में सार्थक कदम है। कुछ राज्य सरकारों ने कौशल विकास के लिए विश्वविद्यालयों की स्थापना भी की इसमें हरियाणा राज्य का विश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय, राजस्थान का कौशल विश्वविद्यालय आदि हैं। 2020 की नवीन शिक्षा नीति कौशल विकास तथा व्यावसयिक शिक्षा के लिए प्रतिबद्ध है जिसमें स्कूलों में हर विद्यार्थी को कक्षा छठी से ही व्यावसायिक शिक्षा लेने की बात कही गई है। तथा स्थानीय व्यावसायिक विशेषज्ञों की सेवा लिए जाने की बात भी उल्लेखनीय है। नई शिक्षा नीति 2020 ने शिक्षा के भारतीयकरण पर जोर दिया है। इस प्रकार व्यावसायिक व कौशल शिक्षा का उचित समन्वयन हमारी युवा पीढ़ी को एक आशा प्रदान करेगा। हमारी परंपरा, संस्कृति व सामाजिक समरसता के साथ-साथ स्वदेशी व स्वावलंबन के उद्देश्य के साथ ही आगे बढ़ कर एक भारत श्रेष्ठ भारत, सशक्त भारत, विश्व का पथ प्रदर्शक भारत, विश्व जन कल्याणकारी भारत एवम विश्वगुरु के पद पर पुनर्प्रतिष्ठित हो सकेगा। और सबका साथ, सबका विकास हो सकेगा। निष्कर्ष स्वदेशी और स्वावलंबन के बारे में निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि जहाँ स्वदेशी हमारी चिंतन की एक धारा है जिसमें समाज का हित तथा राष्ट्र प्रेम की भावना छिपी है। तथा देश की बहुत सारी समस्याओं का समाधान इसमें छिपा है। वहीं स्वावलंबन या आत्मनिर्भरता हमें सुखमय जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त करता है। इन दोनों चिंतनों की धारा एक दूसरे से इस प्रकार से जुड़ी है कि एक दूसरे के बिना किसी के अस्तित्व की कल्पना करना बेमानी है। यह सच है कि देश को एक जिम्मेदार नागरिक होकर अपने रचनात्मक योगदान से देश को जोड़ना चाहते हैं तो हमें स्वदेश तथा स्वदेशी से प्यार करना होगा इसके लिए हमें स्वावलंबी व आत्मनिर्भर बनना होगा। अकर्मण्यता को छोड़ना होगा। तथा हम को सभी को अपने अपने क्षेत्र में कड़ी मेहनत करके देश को सभी क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना होगा। इसके बिन हम आज के संदर्भ में सच्चे देशप्रेमी नहीं कहे जा सकते हैं। देश आज परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त है परंतु आज भी बहुत-सी समस्याएँ सुरसा की तरह मुँह खोल के खड़ी हैं। हम सबको आज के परिवेश में देश की तमाम समस्याओं का समाधान स्वदेशी और स्वावलंबन के मन्त्र से हल करना होगा। आज का दौर नव आर्थिकवाद एवं बाजारवाद का दौर है जिसमें बेरोजगारी तथा प्रतिस्पर्धा की दौड़ में तेजी से दौड़ने की होड़ सर्वत्र दिखाई दे रही है। यह सच है कि इस दौड़ में जो राष्ट्र पीछे रह जाएगा वह अपना अस्तित्व भी खो देगा। अत: आज हमारे देश का हर नागरिक आज एक नवीन आजादी को पाने का सेनानी है और उसे अपने क्षेत्र में कठिन मेहनत करके भारत वर्ष को सच्चे मायने में स्वतंत्र तथा आत्मनिर्भर बनाना है, तभी भारत वर्ष इतिहास में जो ‘सोने की चिड़िया कहा जाता था वह बात यथार्थ में सच होगी। इसके लिए हमें स्वदेशी तथा स्वावलंबन के मन्त्र को सिद्ध करना होगा और भारत वर्ष का डंका विश्व पटल में बजाना होगा।
अंत में, कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।