–राजेंद्र चड्ढा
आत्मनो मोक्षार्थ जगद्धिताय च- अपनी मुक्ति और मानवता की सेवा के लिए ‘ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के दिन लद चुके हैं और अब शूद्र की बारी है, भविष्य पददलितों का है।‘
आज इस बात से कम लोग ही परिचित है कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जीवन पर आरंभिक काल से ही स्वामी विवेकानंद की अमिट छाप थी। यह बात उनके स्वरचित साहित्य में स्पष्ट परिलक्षित होती है। सुभाष के ही शब्दों में, मैं उनकी (विवेकानंद जी) पुस्तकों को दिन-पर-दिन, सप्ताह-पर-सप्ताह और महीने-पर-महीने पढ़ता चला गया। उन्होंने प्राचीन ग्रंथों की आधुनिक व्याख्या की। वे अक्सर कहा करते थे कि उपनिषदों का मूलमंत्र है शक्ति। नचिकेता के समान हमें अपने आप में श्रद्धा रखनी होगी।
सुभाष किशोरावस्था के अपने अनुभव पर लिखते है कि मैं उस समय मुश्किल से पंद्रह वर्ष का था, जब विवेकानंद ने मेरे जीवन में प्रवेश किया। विवेकानंद अपने चित्रों में और अपने उपदेशों के जरिये मुझे एक पूर्ण विकसित व्यक्तित्व लगे। विवेकानंद के द्वारा मैं क्रमश: उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस की ओर झुका।
अपने स्कूल के जीवन में विवेकानंद के प्रभाव के विषय में सुभाष बताते है कि शीघ्र ही मैंने अपने मित्रों की एक मंडली बना ली, जिनकी रूचि रामकृष्ण और विवेकानंद में थी। स्कूल में और स्कूल के बाहर जब कभी हमें मौका मिलता, हम इसी विषय
पर चर्चा करते। क्रमश: हमने दूर-दूर तक भ्रमण करना आरंभ किया, ताकि हम मिल-बैठकर और अधिक बातचीत करने का अवसर मिले।
विवेकानंद के भाषणों और पत्रों आदि के संग्रह छप चुके थे और सभी के लिए सामान्य रूप से उपलब्ध थी। परंतु रामकृष्ण बहुत कम पढ़े-लिखे थे और उनके कथन उस प्रकार उपलब्ध नहीं थे। उन्होंने जो भी जीवन जिया, जिसके स्पष्टीकरण का भार औरों पर छोड़ दिया। फिर भी उनके शिष्यों ने कुछ पुस्तकें और डायरियां प्रकाशित की, जो उनसे हुई बातचीत पर आधारित थी और जिनमें उनके उपदेशों का सार दिया गया था। इन पुस्तकों में चरित्र निर्माण के संबंध में सामान्यत: और आध्यात्मिक उत्थान के बारे में विशेषत: व्यावहारिक दिशा निर्देश दिए गए हैं। रामकृष्ण परमहंस बार-बार इस बात को दुहराया करते थे कि आत्मानभूति के लिए त्याग अनिवार्य है और संपूर्ण अहंकार-शून्यता के बिना आध्यात्मिक विकास असंभव
सुभाष ने कटक से अपनी माँ प्रभावती देवी को इस संबंध में करीब नौ पत्र लिखे थे। ऐसे ही एक पत्र में वे लिखते हैं, ‘संसार के तुच्छ पदार्थों के लिए हम कितना रोते हैं, किंतु ईश्वर के लिए हम अश्रुपात नहीं करते। हम तो पशुओं से भी अधिक कृतघ्न और पाषाण-हृदय हैं।‘
इसी तरह, 8 जनवरी, 1913 को अपने मझले भाई के नाम पत्र में उन्होंने लिखा था- ‘भारतवर्ष की कैसी दशा थी और अब कैसी हो गयी है? कितना शोचनीय परिवर्तन है। कहां हैं वे परम ज्ञानी, महर्षि, दार्शनिक। कहां हैं हमारे वे पूर्वज, जिन्होंने ज्ञान की सीमा का स्पर्श कर लिया था। सब कुछ समाप्त हो गया। अब वेदमंत्रों का उच्चारण नहीं होता। पावन गंगातट पर अब सामयान नहीं गूंजते, परंतु हमें अब भी आशा है कि हमारे हृदय से अंधकार को दूर करने और अनंत ज्योतिशिखा प्रज्जवलित करने के लिए आशादूत अवतरित हो गए हैं। वे हैं- विवेकानंद। वे दिव्य कांति और मर्मवेधी दृष्टि से युक्त हो संन्यासी के वेश में विश्व में हिन्दू धर्म का प्रचार करने के लिए ही आए हैं। अब भारत का भविष्य निश्चित ही उज्जवल है। धर्म और सेवा में रूचि के बावजूद सुभाष ने अपने अध्ययन में उपेक्षा नहीं दिखायी थी। इसी का परिणाम था कि वर्ष 1913 की मैट्रिकुलेशन का परीक्षाफल निकलने पर पता चला कि कोलकाता विश्वविद्यालय के अंतर्गत बैठने वाले दस हजार विदयार्थियों में कटक के सुभाषचंद बोस ने दूसरा स्थान प्राप्त किया।
इसके बाद उच्चतर शिक्षा के लिए सुभाष को कटक से कोलकाता भेजा गया। साढ़े सोलह साल के इस तरुण ने वहां आते ही अपना भावी कार्यक्रम तय कर लिया- ‘मैं दर्शनशास्त्र का गहन अध्ययन करूंगा, जिससे मैं जीवन की मूलभूत समस्या का समाधान प्राप्त कर सकू, व्यावहारिक जीवन में जहां तक संभव हो रामकृष्ण और विवेकानंद के पदचिन्हों पर चलूंगा और चाहे कुछ भी हो, मैं सांसारिकता की ओर नहीं मडूंगा।‘ वे आगे लिखते हैं यह दृष्टिकोण लेकर मैंने अपने जीवन के अध्याय का श्रीगणेश किया।
समाज-सेवा से उनका तात्पर्य अस्पताल या दातव्य चिकित्सालय स्थापित करना नहीं था, जैसा कि स्वामी विवेकानंद के शिष्य किया करते थे, बल्कि मुख्यत: शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रीय पुनर्निर्माण था। अत: हमें नव-विवेकानंद टोली कहा जा सकता था। और हमारा मुख्य उद्देश्य था धर्म और राष्ट्रीयता का न केवल सैद्धांतिक रूप में बल्कि वास्तविक जीवन में भी समन्वय।‘
जिसे कृपा मिलती है, उसका जीवन ही बदल जाता है। मुझे भी कृपा का आभास मिला है, इसीलिए तो देश के कार्य हेतु जीवन देकर इसे सार्थक कर देना चाहता हूं। तुम्हें यह भी बता दूं कि इन्हीं राखाल महाराज (स्वामी ब्रह्मानंद) ने मुझे काशी में यह कहकर वापस लौटा दिया था कि तुझे देश का काम करना है।
क्रांतिकारी नरेन्द्र नारायण चक्रवर्ती ने अपने जीवन की बारह वर्षों से अधिक काल जेलों में विताया था। वे नेताजी स्वामी ब्रह्मानंद से उन्हें भावी जीवन के बारे में पथ प्रदर्शक मिला था। सुभाष जब सद्गुरु की तालाश में उत्तर भारत के विभिन्न स्थानों का भ्रमण करते हुए काशीधाम आये थे तभी उनकी भेंट स्वामी विवेकानंद से हुई थी और उन्होंने कहा है कि गुरु वह है जो तुम्हारे भूत और भविष्य को जान ले उपरोक्त विवरण से ज्ञात होता है। 3 अक्तूबर 1914 ई. दक्षिणेश्वर के काली मंदिर का एक चित्र समरण हो आता है। कमलासन पर विराजने वाली मां काली खड्ग हाथ में लिए शिव के आसन पर खड़ी उनके आगे एक बालक है।
20 सितम्बर 1915 को वे लिखते हैं- शारीरिक स्थिति को देखकर तो विश्वास नहीं होता कि जीवन में मैं कुछ भी कर सकूँगा। विवेकानंद की सभी बातें सत्य है। लोहे के समान सुदृढ़ नाडिया और श्रेष्ट प्रतिभाशाली मस्तिष्क यदि तुम्हारे पास है तो संपूर्ण विश्व तुम्हारे कदमों में झुकेगा।
एक ओर ब्रह्मानंद की बात स्मरण हो जाती है तो दूसरी ओर पाश्चात्य आदर्श जो कर्मणाता को ही जीवन मानता है। एक ओर मौन और शांतिपूर्ण जीवन एक आत्मदर्शी योगी, जिसने जगत की असाधारण का अनुभव कर लिया और दूसरी ओर पश्चिम वालों का विशाल प्रयोगशालाएं उनका विज्ञान दर्शन उनके द्वारा आविष्कृत और प्रकट
की गयी अद्भूत ज्ञान राशि।
18 जून 1928 को कलकता के अल्वर्ट हाल में अखिल भारती वंग समिति द्वारा आयोजित सभा में सुभाष ने कहा, “एक केसाथ बहुत्व का समन्वय यह बंगाल का वैशिष्य है। वास्तविक सत्य को अस्वीकार करने से काम नहीं चलेगा। परमहंस रामकृष्ण व स्वामी विवेकानंद ने कहा कि मनुष्य असत्य से सत्य की ओर अग्रसर नहीं होता वह उच्च सत्य से उच्चतर सत्य की ओर पहुंचता है। सत्य के किसी भी अवसर को वह अस्वीकार नहीं करता जैसे एक सत्य है वैसे बहुत्व भी सत्य है। एकत्व के साथ बहुत्व का मिलाप यही साधक की साधना है। ”
फरवरी 1929 पावना युवा सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा- बहुतों की धारण है कि जन साधारण को या तरुण समाज को जगाने के लिए राष्ट्र या समाज संबंधी मतवादों का प्रचार अनिवार्य है। प्रत्येक मतवाद के कट्टर भक्तों का मत है कि उनके मतवाद की स्थापना हो जाने पर जगत के सारे दुख दर्द दूर हो जाएंगे पर मुझे ऐसा लगता है कि कोई भी मतवाद हमारा तब तक उद्धार नहीं कर सकता जब तक कि हम स्वयं ही मनुष्योचित चरित्र बल प्राप्त न कर लें। इसीलिए स्वामी विवेकानंद जी ने कहा- मनुष्य निर्माण करना ही मेरे जीवन का उद्देश्य है। उन्होंने
अपनी कविता के चार पंक्तियां उद्धृत की थी जिनका भावार्थ है अपार संग्राम ही मां काली की पूजा है। सदा पराजय मिले तो भी भयभीत न होना, हृदय शमशान बन जाये और उसपर श्यामा नृत्य करती हो।
21 जुलाई, 1929 को हुबली में छात्र सम्मेलन के भाषण के दौरान मानों संस्मरणात्म मनोभाव से कहा पंद्रह वर्ष पूर्व जो आदर्श (बंगाल) वस्तुत: पूरे देश छात्रों में अनुप्रमाणित किया करता था। वह विवेकानंद का आदर्श था। आध्यात्मिक शक्ति के बल पर शुद्ध प्रबुद्ध जीवन के प्रति के लिए कटिवद्ध थे समाज और राष्ट्र के निर्माण का मूलमंत्र व्यक्तित्व का विकास इसलिए स्वामी विवेकानंद जी ने कहा मनुष्य निर्माण करना ही मेरे जीवन का उद्देश्य है पर व्यक्तित्व विकास पर जोर देते हुए स्वामी जी राष्ट्र को विलकुल नहीं भूले थे। कार्य रहित संन्यास या पुरुषार्थहीन भाग्यवाद पर उनकी आस्था नहीं थी।
राजाराम मोहन राय के युग में विभिनन आंदोलनों के जरिए भारत की मुक्ति कामना धीरे-धीरे प्रकट हुई। उन्नीसवी शताब्दी के अंतर्गत स्वाधीनता के अखंड रूप का आभास रामकृष्ण विवेकानंद के भीतर झलकता था– ‘स्वतंत्रता-स्वतंत्रता मिट्टी का गीत है।‘ यह संदेश जब स्वामी जी के हृदय से निकला तब उन्होंने समग्र देशवासियों को मुग्ध और उनमत कर दिया।
स्वामी जी ने मनुष्य को तरह-तरह के बंधनों से मुक्त होकर सही मनुष्य बनने के लिए कहा और दूसरी ओर सर्वधर्म समन्वय प्रचार के जरिये भारतीय राष्ट्रीयता की आधारशिला स्थापित की।
10 जनवरी, 1931 को बेलूर मठ के प्रांगण में गंगा तट पर शाम को आम सभा में मठ से आमंत्रण पाकर कोलकता महापौर के रूप में सुभाष ने कहा कि विवेकानंद जी की बहमुखी प्रतिभा की व्याख्या करना कठिन है। मेरे समय का छात्र समुदाय स्वामी जी की रचनाओं और व्याख्यानों से प्रभावित होता था। वैसा किसी ओर से नहीं। मानों उन छात्रों की आशाओं आकांक्षाओं को पूर्ण रूप से अभिव्यक्त करते थे।
13 जनवरी, 1933 को भारत से निवासन के बाद विश्व भ्रमण करते हुए उन्होंने अपना सुप्रसिद्ध ग्रंथ “इंडिया स्ट्रगल” लिखा। इस पुस्तक में वे लिखते हैं, पिछली शताब्दी के आठवों दशक में दो धार्मिक महापुरषों का उदय हुआ जिनका देश के नवनिर्माण की धारा पर विशेष प्रभाव पड़ा वे थे स्वामी रामकृष्ण व उनके शिष्य विवेकानंद एक सनातनी हिन्दू की तरह पले-बढ़े थे और अपने गुरु से मिलने से पहले नास्तिक थे। अपने स्वर्गवास से पहले उन्होंने अपने शिष्य को भारत और विश्व में प्रचार करने का गुरु भार सौप दिया था। तदनुसार स्वामी जी ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, इसके साथ पूर्णतया हिन्दू जीवन का देश और विदेश में खास कर अमेरिका में विशुद्ध हिन्दू धर्म का प्रचार करते रहे उनके लिए धर्म राष्ट्रवाद का प्रेरक था। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जब सुभाष जी 26 फरवरी, 1941 को रात जेल से फरार हो गये तो गुप्त रूप से अफगानिस्तान, जर्मनी होते हुए अंत में जापान पहुंचे। 15 फरवरी, 1942 को सिंगापुर में विश्व सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। दिसंबर 1941 में रासबिहारी बोस ने आजाद हिंद फौज की स्थापना की थी। कैप्टन मोहन सिंह को उसका प्रधान बनाया था। 4 जुलाई 1942 को रासबिहारी बोस ने आजाद हिन्द फौज की बागडोर नेता जी सुभाष बोस को सौंप दी थी। नेताजी के सिंगापुर प्रवास के दौरान के कुछ संस्मरण सिंगापुर रामकृष्ण मठ के प्रमुख स्वामी भास्वरानंद जी ने लिपिबद्ध किये स्वामी जी ने लिखा, उन्होंने समुद्र तट पर एक प्रसादनुमा भवन को अपना आवास बनाया। 1943 विजय दशमी की रात उन्होंने सिंगापुर आश्रम की गतिविधियां जानने की कोशिश की। मां शारदा के जन्मदिवस पर मंदिर से आप ध्यान मग्न होकर बैठे रहे, दुर्गासप्तसती की एक प्रति की इच्छा व्यक्त की।
नेताजी के घनिष्ट सहयोगी आजाद हिन्द सरकार के प्रचार मंत्री श्री एस.एस. अय्यर के संस्मरण उल्लेखनीय हैं। अपनी सुप्रसिद्ध नेताजी की जीवनी में वे लिखते हैं। अपने सिंगपुर निवास काल में अपनी कार भेज कर रामकृष्ण मिशन के प्रमुख स्वामीजी या उनके सहयोगी ब्रह्मचारी कैलाश को बुलवा लेते थे फिर 2-2 घंटे आध्यात्मिक चर्चा के बाद अपने प्रशासनिक कागजात देखते थे। कभी-कभी गुप्त रूप से मिशन अपनी गाड़ी स्वयं चलाकर पहंच जाते थे। हाथ में माला और प्रार्थना ग्रह में ध्यान करते हुए 2-2 घंटे बिता देते।
24 अप्रैल 1945 को रंगून छोड़कर बैकाक के लिए रवाना होने से पूर्व संध्या पर अर्थात 23 अप्रैल की रात को रामकृष्ण मठ में दर्शन के लिए गए थे। स्वामी जी ने उन्हें कहा भारत की आजादी की लड़ाई जारी रखें। नेताजी ने स्वामी जी के आदेश को शिरोधार्य करके अन्य सभी देवताओं-देवियों की अपेक्षा पूर्णयोग से भारत माता की ही उपासना की। बंगला के सुप्रसिद्ध लेखक श्री मोहित लाल मजूमदार ने उन्हें स्वामीजी का ही मानस पुत्र माना।
नव वय का था संक्रमण काल, मनसिज का मन में मधु उबाल, बचपन निखरा बनकर किशोर, धुंधला-धुंधला-सा सभी ओर, था असहनीय मानसिक द्वन्द्व अनबोला। था एक तरफ जग से लगाव, ऊजस के विरुदध विद्रोह भाव जाग्रत था, पर दूसरी ओर कामाग्नि धधकती थी अधोर, नैसर्गिक थी, पर दमन-हेतु मन डोला।। सहसा साहित्य मिला अमूल्य, स्वामी विवेक का सुधा तुल्य, स्वामी जी के सुलझे विचार, भीतर उतरे गहरे अपार, कट गयी दविधा, मिट गया द्वन्द्व-दुख दूना। मिल गया अचानक सार तत्व, जीवन में जिसका अति महत्व मानवता की सेवा प्रक्राम, है आत्म-मुक्ति, अतिशय ललाम, उसमें ही निर्मल देशप्रेम भव-भूना।।
–राजेंद्र चड्ढा, सदस्य केंद्रीय टोली,
प्रज्ञा प्रवाह ए-161, सूरजमल विहार,
दिल्ली-110092