मुंबई, महासंघ के प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल से मुलाकात कर विश्वविद्यालयों की स्वतंत्रता को कम करने का षडयंत्र रोकने हेतु विस्तृत ज्ञापन सौंपा। वर्तमान सरकार विद्या के मंदिर विश्वविद्यालयो की स्वायत्तता पर हमला कर अग्रगामी महाराष्ट्र की गौरवशाली प्रथाओं और परंपराओं को कमजोर करने की कोशिश कर रही है। महाराष्ट्र सार्वजनिक विश्वविद्यालय अधिनियम, 2016 का संशोधन विधेयक महाराष्ट्र विधानसभा में बिना किसी चर्चा के असमंजस की स्थिति में पारित कर दिया गया। अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ ने इस सांविधिक संहिता के उल्लंघन और महाराष्ट्र राज्य में विश्वविद्यालयों के लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी कि ओर राज्यपाल का ध्यान आकर्षित किया। वर्तमान में उच्च शिक्षा और शिक्षकों के सैकड़ों महत्वपूर्ण मुद्दे सरकार के पास लंबित हैं। वेतन आयोग का सही कार्यान्वयन, सेवा शर्तों का उल्लंघन, करिअर एडवांसमेंट स्कीम में विसंगतियां, पेंशन योजना, आदि समस्या और विभिन्न न्यायालय के आदेशों का पालन करने के बजाय सरकार ने विश्वविद्यालय अधिनियम में संशोधन का कदम उठाकर सभी बातो को अनदेखा किया है। यह महाराष्ट्र का दुर्भाग्य है कि सरकार ने विश्वविद्यालय अधिनियम के संशोधन का सहारा लेकर विश्वविद्यालयों की स्वतंत्रता को कम करनेका षडयंत्र रचा है।
महासंघ के पदाधिकारियों ने कहा कि यह संशोधन बिल के जरीये विश्वविद्यालयों को शिक्षा मंत्री के नियंत्रण में लाने के लिए मूल कानून से छेड़छाड़ करने के सरकार का रवैय्या ठीक नही है। महासंघ ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के व्यापक दृष्टिकोण के खिलाफ जाकर शिक्षा क्षेत्र का राजनीतिकरण करने की मंशा का कड़ा विरोध किया है।
राज्यपाल के समक्ष महासंघ द्वारा संशोधन विधेयक में सम्मलित खतरनाक मुद्दों को उजागर किया गया। राज्यपाल के संवैधानिक अधिकारों पर राज्य सरकार का वर्चस्व स्थापित करने के लिए प्रति -कुलपति का पद सृजित किया गया है। महासंघ ने दृढ़ता से कहा है कि इस नए पद को शामिल करना विश्वविद्यालय की संरचना को नष्ट करने के लिए एक प्रभावी कदम है।
संशोधन विधेयक कुलपति की नियुक्ति की प्रक्रिया में राजनीतिक सत्ता के खेल में अकल्पनीय रूप से हानिकारक परिवर्तनों का भी सुझाव देता है। मूल रूप से यह सचिव स्तर का राज्य सरकार प्रतिनिधि, विश्वविद्यालय द्वारा मनोनीत राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान संस्थान के निदेशक, सेवानिवृत्त न्यायाधीश, यह गणमान्य व्यक्तियों और महामहिम राज्यपाल की समिति पर दिखाया गया अविश्वास है। विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को मजबूत करने और उन्हें राजनीतिक दलों के प्रभाव से बचाने के परिणामस्वरूप कुलाधिपति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा और अनिवार्य रूप से शिक्षा की गुणवत्ता पर दीर्घकालिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
विधेयक विश्वविद्यालय के सभी प्राधिकरणों में नियुक्तियों या नामांकनों पर प्रभुत्व स्थापित करने की सरकार की नापाक मंशा को भी दर्शाता है। राज्य भर के मीडिया में कई शिक्षक संगठनों, छात्र संगठनों, शिक्षा विशेषज्ञों और सलाहकार निकायों द्वारा इस बिल की तीखी आलोचना की गई है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार, विश्वविद्यालय के कार्यकारी बोर्ड किसी भी राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त होने चाहिए और उन्हें निष्पक्ष होना चाहिए। शैक्षिक महासंघ के प्रतिनिधिमंडल ने आग्रह किया कि राज्यपाल द्वारा इस संशोधन बिल को सिरे से खारिज कर दिया जाना चाहिए।
प्रतिनिधिमंडल में महासंघ के प्रांतीय अध्यक्ष प्रो. प्रदीप खेडकर (अमरावती), महासचिव डॉ. वैभव नरवाडे (मुंबई), संगठन मंत्री डॉ. विवेक जोशी (गोडवाना), उपाध्यक्ष डॉ. नितिन बारी (जलगांव), डॉ. बालासाहेब आगरकर (पुणे), पूर्व प्रांत अध्यक्ष डॉ. अनिल कुलकर्णी (पुणे) उपस्थित रहे ।