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राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भविष्य के भारत की संकल्पना समाहित है- प्रो. जगदीश प्रसाद सिंघल

जयपुर, राजस्थान विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय शिक्षक संघ (राष्ट्रीय) के 59वें प्रांतीय अधिवेशन के प्रथम सत्र में आयोजित शैक्षिक संगोष्ठी में अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के अध्यक्ष तथा राजस्थान विश्वविद्यालय,जयपुर के पूर्व कुलपति प्रो. जगदीश प्रसाद सिंघल ने ‘ राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शिक्षक की भूमिका : अवसर और चुनौतियां ‘ विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए कहा कि राष्ट्रीय शब्द केवल शाब्दिक दृष्टि से ही समाविष्ट नहीं किया गया बल्कि पूरी शिक्षा नीति में ‘राष्ट्रीयता’ एवं ‘भारतीयता ‘ की दृष्टि का भी समावेश किया गया था, जिसे सभी ने एकमत से स्वीकार किया है । नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शिक्षार्थी और शिक्षा व्यवस्था को समग्रता में भारत केंद्रित किया गया है, जो पूर्व में पश्चिम केंद्रित हुआ करती थी । इस नीति में भविष्य के भारत की कल्पना है, जिसमें सबके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के प्रावधान है।
प्रो. सिंघल ने इस नीति के क्रियान्वयन पर बात करते हुए कहा कि इसमें शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका है, उन्होंने कहा कि यद्यपि भौतिक व मानवीय संसाधनों की उपलब्धता सरकार के द्वारा की जाती है इस दृष्टि से वर्तमान सरकार ने बजट में शिक्षा पर जीडीपी के 6% व्यय के प्रावधान का संकल्प व्यक्त किया है। इसमें कहा गया है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शिक्षक और समाज की महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए। शिक्षक समाज और शिक्षा- व्यवस्था के बीच की कड़ी बन सकता है । शिक्षा नीति में शिक्षा के स्वामित्व पर भी पुनर्विचार करते हुए सरकार के साथ-साथ युवा शिक्षकों को भी आगे आने का आह्वान किया । हमारे देश के युवा विद्यार्थियों, और युवा शिक्षकों की मन:स्थिति परिवर्तनकारी तो होती ही है, परन्तु इसी के साथ उनकी दृष्टि राष्ट्रोन्मुखी तथा देश को आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ाने वाली भी होनी चाहिए । राष्ट्रीय शिक्षा नीति की केंद्रीय संकल्पना में शिक्षक को ही रखा गया है । उन्होंने बताया की राष्ट्रीय शिक्षा नीति शिक्षा के प्रभावी ढंग से लागू होने में ट्रांसफार्म ,रिफॉर्म तथा परफॉर्म शब्दों की महती भूमिका है । इन्हीं से इसकी प्रभावी क्रियान्वित को समझा जा सकता है विद्यार्थी को समाज की अपेक्षाओं के अनुरूप व्यवहार में रूपांतरित होना चाहिए तथा सामाजिक परिवर्तन में सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए । वर्तमान में चल रहे सूचनात्मक आदान-प्रदान को ज्ञान के आदान-प्रदान में व्यावहारिक दृष्टि से बदलना चाहिए क्योंकि सूचनाएं ज्ञान नहीं होती। शिक्षक को विषय का ही नहीं बल्कि समाज का भी शिक्षक होना चाहिए, तभी समाज में शिक्षक की स्वीकार्यता बढ़ेगी । उसे सामाजिक व्यवस्था परिवर्तन का सूत्रधार बनना चाहिए । आज हमें अपनी जड़ों की सुरक्षा के साथ स्वयं को मौलिकता से भी जोड़ना चाहिए ।
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए वर्धमान महावीर मुक्त विश्वविद्यालय कोटा के पूर्व कुलपति प्रो. अशोक शर्मा ने बताया कि समय के साथ शिक्षा नीति में परिवर्तन अत्यावश्यक है। विश्व के अधिकांश विकसित देशों में बदलती हुई शिक्षा नीति के तथा उनके विकास के अनुपात में हमारी शिक्षा नीति में भी सुनियोजित विकास के लिए नए राष्ट्रीय प्रावधानों का स्वागत होना चाहिए । भारतीय ज्ञान परंपरा का विश्लेषण करते हुए उन्होंने बताया कि भारत के प्राचीन काल में आध्यात्मिक ज्ञान तथा भौतिक ज्ञान को समान रूप से प्राथमिकता दी जाती थी, ऐसा माना जाता है कि केवल आध्यात्मिक ज्ञान से व्यक्ति एकांगी हो जाता है जबकि सर्वांगीण विकास के लिए उसे भौतिक ज्ञान की भी अत्यंत आवश्यकता होती है तथा विद्या प्राप्ति से व्यक्ति को मोक्ष तथा आनंद की प्राप्ति होती है । पहले शिक्षा को विद्या ही माना जाता था । मध्य युग में भारत में भी भौतिक शिक्षा का प्रभाव बढा, जो आधुनिक काल में व्यावसायिक शिक्षा में बदल गई। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा को मातृभाषा में दिए जाने पर भी बल दिया।
संगोष्ठी में अपने महत्वपूर्ण सुझावों से संभागियों ने भी उल्लेखनीय भागीदारी की । डॉ. हरि सिंह राजपुरोहित ने सभी वंचितों तक शिक्षा की पहुंच तथा अभावग्रस्त विद्यार्थियों का सहयोग करने का आग्रह किया तथा इतिहास लेखन में जानबूझकर की गई विकृतियों को समुचित तथ्यों के साथ पुनर्लेखन का शिक्षकों का आह्वान किया । डॉ. कश्मीर भट्ट ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से वामपंथी विचार का माकूल जवाब देने तथा विद्यार्थी हित में आवश्यक परिवर्तन किए जाने पर जोर दिया । डॉ. विष्णु दत्त दवे ने प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में देने, चयन आयोगों द्वारा शिक्षकों के चयन में पारदर्शिता लाने तथा देश के अनुरूप इतिहास लेखन पर जोर दिया । डॉ.सीताराम चौधरी ने उच्च शिक्षा में ब्यूरोक्रेसी के हस्तक्षेप का विरोध किया । डॉ. महेश गर्ग ने मातृभाषा के समर्थन के साथ विदेशी भाषाओं की पुस्तकों को भी सम्यक दृष्टि से पढ़ने की बात कही। डॉ. ओपी शर्मा ने तथा डॉ. धनंजय सिंह ने भी संगोष्ठी में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की । संगोष्ठी का संचालन डॉ. ओम प्रकाश पारीक ने किया।
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