डूंगरपुर,14 जुलाई, एस. बी. पी. राजकीय महाविद्यालय डूंगरपुर में गुरु वन्दन कार्यक्रम के मुख्यवक्ता रुक्टा राष्ट्रीय के प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य डॉ गीताराम शर्मा, विशिष्ट अतिथि कन्या महाविद्यालय डूंगरपुर के सहआचार्य डॉ विवेक कुमार मण्डोत थे | इस अवसर पर बांसवाड़ा विभाग अध्यक्ष डॉ गणेश निनामा ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि गुरु का स्थान भारत में सर्वोपरि रहा है, महान गुरुओं के कारण ही भारत विश्व गुरु था|
विशिष्ट अतिथि रुक्टा राष्ट्रीय के मीडिया प्रभारी एवं राजकीय कन्या महाविद्यालय डूंगरपुर के सह आचार्य डॉ विवेक मण्डोत ने कहा कि आज विज्ञान और तकनीकी विकास के दौर में उचित और अनुचित विवेक जागरण के लिए गुरु के रुप में शिक्षक की भूमिका और अधिक प्रासंगिक हो गयी है |गुरु का प्रमुख कार्य शिष्य की क्षमताओं का प्रकटीकरण कर उन्हें उसके व्यक्तत्व निर्माण और समाज हित में लगाना है |
मुख्य वक्ता डॉ गीताराम शर्मा ने महर्षि वेद व्यास का विशिष्ट अकादमिक और सांस्कृतिक योगदान निरुपित करते हुए कहा कि रुक्टा राष्ट्रीय द्वारा गुरुवन्दन जैसे कार्यक्रमों का ध्येय अपनी महान परम्परा के प्रति कृतज्ञता पूर्वक आत्म चिंतन तथा समाज में गुरु की वरेण्य भूमिका की पुन: स्थापना करना है | उन्होंने कहा कि यह पर्व वेद के चतुर्धा विस्तारक,ब्रह्म सूत्र, महाभारत और अष्टादश पुराण के रचयिता भगवान विष्णु के अवतार श्री वेद व्यास के जन्मोत्सव के रुप में मनाया जाता है |इसी दिन भगवान शंकर ने अपने शिष्य सप्तर्षियों को ज्ञानोपदेश दिया था | इसी दिन भगवान महावीर ने अपना प्रथम ज्ञानोपदेश दिया था | गुरु पूर्णिमा भारत में गुरु शिष्य के अन्त: सम्बन्धों की मजबूती का सूत्र है| गुरु अखंड मंडलाकार ज्ञान का प्रतीक है जिसका न प्रारंभ है ना कोई अंत ।गुरु बनते या बनाते नहीं, आत्म चेतना को जगाते हैं। सभी की गूढ़ और सुप्त अन्त:चेतना जब किसी के प्रत्यक्ष अथवा भावात्मक सम्पर्क से स्फूर्त हो उठती है, तो उस जगाने वाली सत्ता को गुरु कहते हैं। जो कोई जिंदगी को अंधकार से प्रकाश की ओर प्रेरित करे, उसे गुरु कहा जाता है। गुरु की यह जिम्मेदारी है कि वह शिष्यों के व्यक्तित्व में ऐसा गुरुत्वाकर्षण पैदा करें कि सारा समाज उसकी ओर आकर्षित हो सके। हमारी महान गुरु परम्परा में ऐसा गुरुत्वाकर्षण पैदा करने के हजारों अमर उदाहरण हैं। यह अपने अनुकूल स्वयं और समाज के हितकारी भाव से उपयोगी और मजबूत बनाने का काम शिक्षक का है। शिक्षक केवल सिखाने वाला होता है लेकिन सीखे हुए को आचरणीय बनाने की कला का विकास करने वाले को गुरु कहा जाता है। हमारे यहां गुरु को व्यक्ति केन्द्रित न मानकर तत्व केन्द्रित माना। यानी जीवन में भव्यता लाने की कला की प्रेरणा जिस किसी से मिलती है वे सभी गुरु हैं। प्रकृति के कण-कण में यह गुरुता विद्यमान है। गुरु शिष्य को जाग्रत करता है,और शिष्य गुरु के व्यक्तित्व को अमर कर देता है। शास्त्रों ने इस जोड़ी को तेजस्वियों की जोड़ी कहा है। इन सब का आशय है कि यह दिन गुरु के लिए भी पूर्णिमा है और शिष्य के लिए भी। दोनों को तेजस्विता के माध्यम से अमर होने का अवसर देती है। वास्तव में तो यह गुरु और शिष्य दोनों के लिए चिन्तन का दिन है। अंधेरे में से क्या बाहर आ सका और क्या छूट गया जिसे आगे लाने में हित है, यह चिन्तन-मनन करने का दिन है गुरु पूर्णिमा। जैसे शिष्यों को गुरु के स्मरण से कुछ विलक्षण अनुभूति होती है वैसे ही गुरु को शिष्यों का स्मरण करते विलक्षण अनुभूति होती है। एक बात तय है कि यदि कोई शिक्षक विद्यार्थियों के हृदय में प्रवेश कर गया तो वह जीवनपर्यन्त निकल नहीं सकता | इस भाव से पूजन का पर्व है इसलिए प्रत्यक्ष सान्निध्य और असान्निध्य ज्यादा महत्व नहीं रखते। डॉ सीमा शकुनि ने गुरु महिमा पर कविता पाठ किया |कार्यक्रम का संचालन डॉ निमेष कुमार चौबीसा ने किया तथा आभार शैवेन्द्र कुमार व्यास ने किया | इस अवसर पर महाविद्यालय तथा कन्या महाविद्यालय शिक्षकों की बड़ी संख्या में गरिमामय सहभागिता रही|